गिलगिट-बाल्टिस्तान प्रॉविंस की कवायद, पाकिस्तानी छटपटाहट या चीनी चाल?

भारत ने पाकिस्तान के इस कदम का सख्त विरोध करते हुए कहा कि अवैध कब्ज़े वाले क्षेत्र (PoK) में पाकिस्तान चुनाव कराने की हिमाकत के तौर पर गलत कदम उठा रहा है। गिलगिट-बाल्टिस्तान भारत का अभिन्न अंग है।

दो स्थितियां अहम हैं। एक, समुद्र में भारत और अमेरिकी बलों की भारी तैनाती से खतरा महसूस करने वाले चीन को व्यापार, खास तौर से तेल के आयात के लिए एक सेफ रूट चाहिए, जो पाकिस्तान उसे देता है। आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) के एवज़ चीन ने न केवल पाकिस्तानी बंदरगाह को एक तरह से हथिया लिया है बल्कि अपना मिलिट्री बेस भी बना लिया है। दूसरे, ये कि ऐसे समय में, जब पाकिस्तान आतंक के कारण और चीन Covid-19 व विस्तारवादी नीतियों के चलते दुनिया से कट गए हैं, तो एक दूसरे के स्वाभाविक साथी बन चुके हैं।

चीन के कर्ज़ और एहसानों के तले दबा हुआ पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के इशारों पर नाचने के लिए मजबूर है। वहीं, भारत के साथ सीमा पर चीन ने जो तनाव बना रखा है, उसके चलते भी पाकिस्तान उसके लिए अहम है। इन स्थितियों में पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में गिलगिट-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान के नये पूरे प्रॉविंस के तौर पर जल्द घोषित किए जाने की खबरें खासी रणनीतिक अहमियत रखती हैं क्योंकि भारत इस कदम पर विरोध दर्ज करा चुका है।

पाकिस्तान के दावे वाले गिलगिट और बाल्टिस्तान इलाके का नक्शा विकिकॉमन्स से साभार।

भारत को जवाब देने की छटपटाहट
इस पूरे मामले को समझने के लिए करीब दो हफ्ते पहले की रिपोर्ट्स को समझना ज़रूरी है। बीते 16 सितंबर को गिलगिट-बाल्टिस्तान के मामलों के मंत्री अली अमीन गंडापुर ने कहा कि पीएम इमरान खान जल्द ही पाकिस्तान के पांचवे प्रॉविंस की घोषणा कर सकते हैं। भारत के पिछले साल कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने के कदम का करारा जवाब देने की पाकिस्तान की छटपटाहट के तौर पर इस कदम को डिकोड किया जा रहा है।

इससे पहले भारत को घेरने के लिए पाक ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर से धारा 370 से हटाए जाने के मामले को उठाया था। यही नहीं, पाक ने भारतीय कश्मीर को अपने नक्शे में दिखाने की हिमाकत भी की थी। लेकिन, विशेषज्ञों की मानें तो इन कदमों से भारत को जब झटका नहीं लगा तो पाक एक खास चाल की जुगत में था।

क्या ये चीन की मर्ज़ी के बगैर मुमकिन है?
जी नहीं। बहुत सीधी सी बात है कि चीन ने पाकिस्तान में जो इकोनॉमिक कॉरिडोर बनाया है, उसका रूट गिलगिट-बाल्टिस्तान से होकर है और यहां चीन का बहुत बड़ा निवेश है। दूसरे, लद्दाख में भारत के साथ संघर्ष की जो स्थितियां पिछले तीन महीनों से बनी हुई हैं, उनके मद्देनज़र चीन की मर्ज़ी और इजाज़त के बगैर यहां पाकिस्तान कोई बड़ा रणनीतिक या राजनीतिक फेरबदल कर पाने की स्थिति में नहीं है। डिप्लोमेट के लेख में भी साफ है कि भले ही पाक के इस कदम के पीछे चीन का दिमाग न हो, लेकिन चीन का उकसावा तो है ही।

कितने दबाव में है पाकिस्तान?
चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की महत्वाकांक्षी परियोजना के क्षेत्र में भी पाकिस्तान का हिस्सा शामिल है। गिलगिट-बाल्टिस्तान में इस बीआरआई प्रोजेक्ट अन्य इलाकों की तुलना में बहुत तेज़ी से विस्तार हो रहा है। इसी साल जून में पूरी तरह चीन के फंड से ग्वादर पोर्ट से कशगर तक रेलवे लाइन के काम के लिए 7।2 अरब डॉलर मंज़ूर किए गए थे।

कुल मिलाकर पाक में चीन 60 अरब डॉलर से ज़्यादा के निवेश कर चुका है और जो गुप्त ढंग से उसने पाक को भारी भरकम कर्ज़ दिए हैं, वो अलग हैं। पाकिस्तान इस हालत में है ही नहीं कि वो चीन को ‘न’ कर सके।

क्या आसान है प्रॉविंस बनाने की राह?
भले ही चीन का बैकअप हो, लेकिन पाकिस्तान के लिए यह आसान नहीं होगा कि वह गिलगिट-बाल्टिस्तान को प्रॉविंस बना पाए क्योंकि यहां लोग कथित तौर पर पाकिस्तान के विरोध में हैं। अंतर्राष्ट्रीय डिफेंस में दखल रखने वाले लेखक अमित बंसल के लेख में बताया गया है कि प्रॉविंस बनाने के लिए पाक के सामने क्या चुनौतियां होंगी।

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खूंजरेब पास पर पर्यटकों का एक फाइल चित्र।

– डोगरा साम्राज्य के ज़माने में एक कानून था, जिसके तहत किसी ज़मीन को सरकारी प्रोजेक्ट के लिए बगैर मुआवज़े के टेकओवर किया जा सकता था। ऐसे पुराने कानून से यहां पाकिस्तान भूमि अधिग्रहण कर रहा है।
– दूसरा मुद्दा यह है कि यहां पिछले कई सालों में पाकिस्तान सरकारों ने कुछ नहीं किया है। सड़क, स्वास्थ्य और विकास के नाम कोई काम नहीं हुआ है। यहां के लोग पाकिस्तान के खिलाफ हैं।
– तीसरा मुद्दा है यहां की नस्ल। यहां शिया बहुल आबादी है, जो सुन्नी बहुल पाकिस्तान का साथ देने में हिचकेगी क्योंकि पाकिस्तान में गैर सुन्नियों जैसे हाज़रा, अहमदी आदि का हाल दमन का ही रहा है।
– यहां चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर की वजह से विस्थापित हो चुके हज़ारों परिवार अब भी मुआवज़े के लिए लड़ रहे हैं और उन्हें पाकिस्तान से कोई मदद नहीं मिली है।

माना जा रहा है कि इन तमाम स्थितियों के चलते पाकिस्तानी पीएम पाकिस्तानी सूबे को बहाल करने के लिए यहां के लोगों को किसी किस्म का लालच दे सकते हैं या तुष्टिकरण की नीति अपना सकते हैं। इसके बावजूद, पाक की राह जल्द आसान होती नज़र नहीं आ रही है, लेकिन भारत को यहां लगातार नज़र रखकर रणनीतिक कदम भी उठाने होंगे।

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