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जानिए कब से शुरु हो रहा नवरात्रि पर्व, व क्या है नवरात्रि पर्व का महत्व
 

हिंदु धर्म में वैसे तो हर एक पर्व का अपना खास महत्व होता है, व हर पर्व को हर्ष एवं उल्लास के साथ रीति- रीवाजों के अनुसार मनाया जाता है, इसी के तहत नवरात्रि पर्व का भी अपना एक खास महत्व है। लोग पूरी श्रद्धा भाव के साथ भक्ति में झूमते हुए नवरात्रि का पर्व मनाते है। नवरात्रि का पर्व नौ दिनों का होता है, हर एक दिन माता के अलग- अलग रुपों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इन नौ दिनों में माता धरती पर प्रकट होती है, व माता का धरती पर आना उनके मायके में आने के समान माना जाता है।

अर्थात इन दिनों धरती पर माता का मायका होता है। नवरात्रि पर्व की तैयारियां पूरे जोरों- शोरों से चलने लग गई है। लोग माता के आवागमन की पूरी तैयारियां करने लग गए है, घरों की साफ- सफाई से लेकर सजावट और माता के स्थान पर भी रंग रोगन का कार्य शुरु कर दिया है। बाजार भी नवरात्रि पर्व के लिए गुलजार हो गए है। माता के श्रृगार की सामग्री से लेकर प्रसाद, चुनरी आदि सभी से दुकानें सज गई है।

आइए अब जानते है, कि नवरात्रि का पर्व कब से शुरु हो रहा है-

नवरात्रि का पर्व 26 सितंबर से शुरु होकर 4 अक्टूबर तक का है, यानि नौ दिनों तक चलने वाला नवरात्रि का पर्व 26 सितंबर से शुरु हो रहा है। नौ दिनों तक सभी भक्त माता की भक्ती में झूमेंगे, साथ ही माता को प्रसन्न करने के लिए व्रत भी रखेंगे। बताया जाता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा की सच्चे मन से भक्ति की जाए, तो माता उस भक्त की सारी समस्याएं दूर कर देती है, और प्रसन्न होकर अपने सच्चे भक्त की झोली में खुशियों का अपार भंडार भर देती है। भक्त भी नौ दिनों तक माता को प्रसन्न करने के लिए सच्चे मन से माता की भक्ति करते है, साथ व्रत रखकर अपने जीवन में सुख- समृद्धि की कामना करते है।

नौ दिनों तक जो लोग व्रत रखते है, वह केवल रात को ही फलों का सेवन करते है, इसके अलावा वह नौ दिनों तक अन्न का सेवन नहीं करते है।कुछ लोग ऐसे भी होते है, जो नौ दिन तक व्रत रखते है, और शाम को आलू, पूरी, खीर का प्रसाद बनाकर उसे ग्रहण कर व्रत तोड़ते है, और फिर दूसरे दिन में व्रत रख लेते है। हालांकि व्रत रखने के सबके अपने- अपने नियम होते है, कोई दिन में फलों का सेवन कर साबूतदाने की खिचड़ी खाकर व्रत रखता है, तो कोई पूरे नौ दिनों तक बिना अन्न का सेवन किए व्रत रखता है। यह अपने भक्ति भाव के अनुसार ही भक्त करते है।

नवरात्रि के दिनों में माता के नौ रुप पहला शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्मचारिणी, तृतीया चन्द्रघण्टा, चतुर्थ कूष्माण्डा, पंचम स्कंदमाता, षष्ठ कात्यायनी, सप्त कालरात्रि, अष्ट महागौरी और नवमी सिद्धिदात्री के रुप में पूजा की जाती है। नवरात्रि के प्रथम दिन यानि शैलपुत्री के रुप में माता की पूजा की जाती है, पहले दिन पूजा शुरु करने से पहले कलश स्थापना की जाती है।

जानिए कैसे की जाती है, कलश स्थापना

देवी – देवताओं के आहान से पहले हमेशा कलश की स्थापना की जाती है, वहीं कलश स्थापना का भी बहुत बड़ा महत्व है, साथ ही कलश की स्थापना सही ढंग से की जानी चाहिए। पूजा शुरु करने से पहले कलश को स्थापित किया जाता है, इसलिए हर एक शुभ कार्य में कलश स्थापना का विशेष महत्व माना जाता है। इसके साथ ही कलश स्थापित करने के लिए विधि- विधानों का पता होना भी आवश्यक माना जाता है। तो आइए जानते है, कैसे करें कलश को स्थापित। कलश स्थापित करने से पहले यह जान लें कि इसके लिए किन- किन चीजों की जरुरत पड़ती है। इसके लिए आपको शुद्ध जल, थोडा सा गंगाजल, गंध, सर्वोषधि, दूब, कुशा, सप्त मातिृका, पुंगीफल यानी सुपारी, पंचरत्न, दक्षिणा या स्वर्ण, आम या अशोक वृक्ष के पत्ते, मौली, चावल और पानी वाला नारियल चाहिए।

अब सबसे पहले कलश लें, और इसमें शुद्ध जल भर लें, फिर इसमें थोडा सा गंगाजल मिलायें, फिर सर्वोषधि, दूब, कुशा, सप्तमातिृका, पुगीफल, पंचरत्न के अभाव में आप पांच सिक्के डाल दें, दक्षिणा में स्वर्ण के अभाव में सिक्का डालें। फिर कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते इस प्रकार रखें कि वे आधे बाहर व आधे कलश में रहे। इसके बाद कलश पर एक पात्र में चावल भर कर रखें, इस पर मौली से बांध कर या चुनरी ओढा कर पानी वाला नारियल रखें। फिर वरूण देवता का आहृवान कर कलश की पूजा करें, कलश पर स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं व पुष्प अर्पित करें, और इसे पूजा में बायीं ओर विराजमान करें। इस तरह की विधि अपनाकर आप कलश स्थापना कर सकते है। इसके साथ ही नवरात्रि में जौ भी बोई जाती है, जौ की बालियों को अंतिम दिन कन्या जिमाने वाले दिन कन्याओं के सिर पर ऱखकर माता का आशीर्वाद लिया जाता है। कलश स्थापना के साथ ही जौ को भी बो देना चाहिए।

इसके लिए एक मिट्टी का पात्र लें, और उसे मिट्टी से पूरा भरकर उसमें जौ को बो दे। और प्रतिदिन पूजा करने से पहले शुद्ध जल से जौ की रुपाई करें। प्रतिदिन जौ में पानी डालने से नौवें दिन तक जौ की बड़ी- बड़ी बालियां पूजा के लिए हो जाएंगी। यह तो था कलश स्थापना, अब नवरात्रि के दिनों में अखंड ज्योति का भी एक विशेष महत्व माना जाता है। अखंड ज्योति को नौ दिनों तक निरंतर जलाए रखा जाता है। दिन- रात अखंड ज्योति को जलाए रखना होता है, किसी भी हाल में अखंड ज्योति को बुझने नहीं दिया जाता। अखंड ज्योति जलाने के लिए शुद्ध गाय के घी का प्रयोग किया जाता है, वहीं अगर किसी के घर में गाय का घी नहीं है, तो वह शुद्ध सरसों के तेल या फिर तिल के तेल का प्रयोग कर सकता है। दीपक को माता रानी की मूर्ति के दाई ओर रखा जाता है। जैसे ही दीपक में तेल या फिर घी कम होता है, उसे तुरंत फिर से भर देते है, लेकिन दीपक को बुझने नहीं दिया जाता।

आइए जानते है, नवरात्रि पर्व का महत्व

हिंदु धर्म में नवरात्रि का पर्व साल में चार बार आता है, लेकिन चैत्र पक्ष के नवरात्र और शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व माना जाता है। आगामी 26 सितंबर से आने वाले नवरात्र शारदीय नवरात्र है। इन नवरात्रों का विशेष महत्व होता है। चैत्र नवरात्रि से हिंदु नववर्ष की शुरुआत होती है, तो वहीं शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है। बताया जाता है कि शारदीय नवरात्रि धर्म की अधर्म पर और सत्य की असत्य पर जीत का प्रतीक है।

इसी के साथ नवरात्रि के महत्व का भी पता चलता है, कि क्यों नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। कहा जाता है, कि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है, और धरती को माता का मायका कहा जाता है। माता के आने की खुशी में इन दिनों दुर्गा उत्सव के तौर पर मनाया जाता है, साथ ही दुर्गा उत्सव की देशभर में धूम मची रहती है। नवरात्रि मनाए जाने को लेकर दो पौराणिक कथाएं प्रचलित है। पहली कथा के अनुसार महिषासुर नामक एक राक्षक ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे वरदाना मांगा था कि दुनिया में कोई भी देव, दानव या धरती पर रहने वाला मनुष्य उसका वध न कर सके, इस वरदान को पाने के ​बाद महिषासुर आतंक मचाने लगा, उसके आतंक को रोकने के लिए शक्ति के रुप में मां दुर्गा का जन्म हुआ। मां दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक युद्ध चला, और दसवें दिन मां ने महिषासुर का वध कर दिया।

दूसरी कथा के मुताबिक जब भगवान राम लंका पर आक्रमण करने जा रहे थे तो उससे पहले उन्होंने मां भगवती की अराधनी की, भगवान राम ने नौ दिनों तक रामेश्वर में माता का पूजन किया, और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उन्हें जीत का आर्शीवाद दिया। दसवें दिन राम जी ने रावण को हराकर लंक पर विजय प्राप्त की थी, तभी तक विजयदशमी का त्योहार मनाया जाता है। इन कथाओं के अनुसार सत्य की असत्य पर और धर्म की अधर्म पर जीत होने पर नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।