“शिक्षा बनाम संवेदनाएँ” क्या मनुष्य के अन्दर अभी भी संवेदनाएं बची हैं…?

कुत्ते की पूंछ से पटाखे बाँधकर उसमें आग लगा देना और फिर जब वो उछल कूद करके भोंके तो ताली बजाकर खूब हंसना, बचपन की यादों को जब कोई सुनाता है तो यह सबसे प्रमुख याद होती है। शायद इसी के अनुसार हम कह देते हैं कि बड़े होने पर हमें संवेदनशील हो जाना चाहिए क्योंकि हम पढ़-लिख लेते हैं। लेकिन क्या सचमुच पढ़ाई का और संवेदनाओं का कोई आपसी रिश्ता है। शायद नहीं। संवेदनाएँ तो जानवरों में इंसानों से अधिक होती है जो कभी किसी स्कूल में पढ़ने ही नहीं जाते। इसी का उदाहरण केरल के मल्लपुरम् में देखने को मिला।

शिक्षित संस्कारी संवेदनशील मानव ने भूखी गर्भवती हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिला दिया। परिहास की यह परकास्ठा थी या उपहास का भी उपहास…..यह बुद्धिजीवियों को सोचना चाहिए, मैं तो बस इतना ही सोच रही हूँ कि क्या होता यदि उस समय दर्द से बिलखती, अपने बच्चे की चिंता करती वह हथिनी असंवेदनशील हो जाती और पूरे के पूरे गाँव में विनाश की लहर ले आती पर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसमें संवेदनाएँ थी जो कह रही थी-

जिसने आपके साथ बुरा किया उसके साथ बुरा करने से उसमें और हमारे अंदर कोई फर्क नहीं कर जाता, मानव तो है ही ऐसा ही, कभी पेट की भूख के नाम पर, कभी स्वाद के नाम पर, कभी मनोरंजन के नाम पर, कभी मजाक के नाम पर वह जानवरों के साथ अति करता आय़ा ही है, हम उसके जैसे हो गए तो हम में और उसमें क्या फर्क रह जायेगा।
सुनकर रोंगटे खड़े कर देने वाली इस घटना से हम इंसानों ने क्या अब तो कुछ सीखा है या हम साबित करने में पीछे नहीं है कि हम से बड़ा कोई जानवर इस धरती पर नहीं है।

वह हथिनी अपने मुँह की जलन मिटाने के लिए पानी में अपना मुँह रखके खड़ी होती है और वहीं खड़ी-खड़ी मर जाती है, उसकी वह संतान मर जाती है जिसने इस खूबसूरत दुनिया में कदम ही नहीं रखा।
क्या मजाक-मजाक में ऐसी घिनौनी हरकत करने वालों को कुछ बात अब समझ में अब आई है। मनोरंजन के नाम पर कुछ भी किया जाना ! उफ क्या कहूँ और क्या लिखूँ, सच में डूब मरना चाहिए हमें, खुद को संवेदनशील कहते हैं पर संवेदनाओं का स भी हम नहीं समझ पाते जो सद्भाव सिखाता है पर हम स्वार्थ सीखते हैं और मनोरंजन के नाम पर भी स्वार्थी बन जाते हैं।

मजे-मजे में छिपकली की पूंछ काट देना, लाखों चींटियों को एक साथ मार देना, आँगन में चलते छोटे जीवों को जानबुझकर पैरों से कुचल देना, कुत्ते पर पत्थर फैंकना, चिड़िया का घोंसला तोड़ देना आदि आदि हरकतों से अब हमारा मन नहीं भरता, अब हमें करने के लिए कुछ बड़ा चाहिए, इतना बड़ा कि पृथ्वी के सबसे बड़े जीव को परेशान किया जाए। कुछ ऐसे कि वह मर ही जाए और हम हमारी महानता साबित कर दे कि उससे कद में छोटे होकर भी उस पर काबू पा लिया और उससे मनोरंजन कर लिया!

यदि जवाब यह है कि ये जानवर जंगलों से शहरों की तरफ आधिक आते ही क्यों है तो मैं कहना चाहूँगी कि वे जंगलों से शहरों की तरफ नहीं आते हैं, हमने उनके जंगलों में शहर बना लिये हैं और उन्हें उन्हीं के स्थान से दूर दखेल दिया है। मेहरबानी है उनकी कि वे प्रतिदिन हमें परेशान करने नहीं आते। कभी कर भी देते हैं तो मात्र इसलिए कि वे खुद की रक्षा करना चाहते हैं।

मैं उस हथिनी और उसके अजन्मे बच्चे से माफी माँगने की सिवाय और कर भी क्या सकती हूँ। जानवर के लिए मानव के खिलाफ जब मानव शिकंजा कसेगा तो वह कितना मजबूत और कितना कमजोर होगा इस बारे में मैं कोई कमेंट नहीं करना चाहती…..
ओम शांति

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