Tuesday, July 27, 2021
Home ओपिनियन रहने की स्थितियों के सर्वे में दिल्ली को 65वां स्थान

रहने की स्थितियों के सर्वे में दिल्ली को 65वां स्थान

भारत सरकार के आवासन और शहरी विकास मंत्रालय ने देश के 111 शहरों में ‘रहने की स्थितियों‘ का सर्वे किया है। इसमें उत्तर भारत के ज्यादातर शहर फिसड्डी साबित हुए हैं। अफसोस है कि देश की राजधानी दिल्ली को सर्वे में 65वां स्थान मिला जबकि राजस्थान में राजधानी जयपुर सहित एक भी शहर पहले 25 में भी जगह नहीं बना पाया। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल 10वें, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर 7वें और इंदौर 8वें स्थान पर रहे हैं। महाराष्ट्र खुश हो सकता है कि उसके तीन शहर पुणे, नवी मुंबई और ग्रेटर मुंबई क्रमशः पहले तीन स्थानों पर हैं।
कुछ दशक पहले शहर नाम के मोहपाश से हर कोई बंधा था। इसका जादू सभी के दिलोदिमाग पर ऐसा तारी था कि हर कोई यहां रहने को खिंचा चला आता था। यह आकर्षण आज भी है लेकिन ग्रामीण इलाकों में बढ़ते सुख-सुविधा के साधनों ने शहर आने की गति को मंद किया है लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी है। शहरों में उनकी क्षमता से कई गुना ज्यादा आबादी ठसाठस हो चुकी है, लिहाजा पहले से अपर्याप्त संसाधनों के दोहन की स्थिति विकराल होती जा रही है। हाल ही में इकोनाॅमिक इंटेलिजेंस यूनिट ने दुनिया के 140 शहरों की रैंकिंग इसी पैमाने पर की तो उसमें हमारे सिर्फ दो शहरों दिल्ली और मुंबई को बहुत नीचे स्थान मिला।
13 अगस्त को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक रिपोर्ट जारी कर बताया कि अगर भारत अपने शहरों की हवा गुणवत्ता को तय मानकों के हिसाब से कर ले, तो देश के हर नागरिक के जीवनकाल में चार साल का इजाफा हो जाएगा। शहरों की इस दुर्दशा के लिए सरकारों के साथ एक हद तक हम लोग भी जिम्मेदार हैं। ऐसे में आत्मचिंतन का विषय है कि हम अपने शहरों को रहने लायक कैसे बनाएं? सपनों के शहर को बनाने के लिए सरकारों के साथ हमारी भागीदारी की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।
क्या ‘रहने की स्थितियों‘ जैसे सर्वे के आधार पर किसी को खुशी और किसी को दुखी होना चाहिए? शायद हां, लेकिन इतना जरूर है कि हमारी सरकारों को, चाहे वह केंद्र की हो अथवा राज्यों की या फिर शहरों की, सबको आत्मचिंतन करना चाहिए। उनके कर्ता-धर्ताओं को चाहे वे प्रधानमंत्राी-मुख्यमंत्राी, शहरी विकास मंत्राी या फिर मेयर, कोई भी हों, उन्हें सोचना चाहिए कि आखिर ऐसे हालात क्यों बन रहे हैं? दिल्ली को सर्वे में 65वां स्थान मिलता है तो शर्म किसे आनी चाहिए? ये ऐसे सवाल हैं जिन पर राजनीति से ऊपर उठकर ही चिंतन- मनन होना चाहिए।

केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय द्वारा देश के रहने लायक शहरों की रैंकिंग के मानकों में रोजगार, शिक्षा, सफाई, चिकित्सा, सुरक्षा, परिवहन, प्रदूषण इत्यादि सुविधाएं शामिल हैं जो किसी भी शहर के बेहतर जीवन-यापन की रीढ़ होती हैं जबकि हमारे देश में आज भी शहर बुनियादी सुविधायों के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं हालांकि विदेश में यह स्थिति नहीं है। वहां पर भारतीय भी इसीलिए जाना और रहना पसंद करते हैं क्योंकि वहां बुनियादी सुविधाओं के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ता।
किसी शहर को रहने लायक बनाने के लिए बिजली, पानी, जल निकासी, सीवरेज सिस्टम, सफाई, कूड़ा प्रबंधन, पार्किंग, अच्छी सड़कें, बाजार और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम अनिवार्य होना चाहिए। इससे अधिक जरूरी होता है सभी वर्ग के लिए आवास उपलब्ध हों लेकिन समय से इन सुविधाओं की अनदेखी कर अनियमित कालोनियां बसने लगी हैं और उसका प्रभाव शहर पर पड़ने लगा है।
भौतिक सुविधाएं किसी भी शहर को रहने योग्य बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं। इनमें प्रदूषण की कमी, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, अपशिष्ट जल प्रबंधन, परिवहन और गतिशीलता, बिजली की आपूर्ति, जल आपूर्ति, सार्वजनिक खुली लगह आदि शामिल होते हैं। ये सब प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालते हैं। इसलिए किसी भी शहर के वायु, जल और मिट्टी के प्रदूषण को कम किया जाना बहुत जरूरी है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि तमाम बड़े शहर अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, इसलिए उनकी स्थिति और रैंकिंग दोनों में सुधार किया जाना अत्यंत जरूरी है।
भारतीय शहरों की सबसे बड़ी समस्या वहां की बढ़ती आबादी और घटते संसाधन हैं। बड़े शहरों में ही रोजगार के अवसर होते हैं और सुविधाओं की स्थिति भी बेहतर होती है। इसीलिए गांव और छोटे शहरों के लोग इनके प्रति आकर्षित होते हैं। जब इन शहरों की आबादी बढ़ती जाती है तो सुविधाएं कम पड़ने लगती हैं। मध्यम वर्ग वाले शहर, इस लिहाज से अपेक्षाकृत बेहतर होते हैं। वहां आबादी का दबाव ज्यादा नहीं होता तो बुनियादी सुविधाओं का संघर्ष भी कम रहता है।
शहर जरूरत से अधिक भर गए हैं। इतनी अधिक आबादी के लिए रहने की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती है। इस कारण शहरों में झुग्गी बस्तियां बढ़ रही हैं। आबादी बढ़ने से शहर में मौजूद संसाधनों का उपयुक्त इस्तेमाल नहीं हो पाता है। न तो वहां पहले से रहने वाले और न गांवों से आने वाले लोग इन संसाधनों का उचित लाभ उठा पाते हैं। शहरों की प्लानिंग ठप्प पड़ जाती है। प्रदूषण बढ़ता है। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग स्वच्छता के अभाव में कई प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं।
लोग भले ही नौकरियों की आस में शहरों की तरफ पलायन करते हैं लेकिन सभी को नौकरी भी नहीं मिलती है। नौकरी मिल भी जाती है तो बड़े शहरों की महंगाई के आगे उनकी कमाई कम पड़ जाती है। इससे गरीबी बढ़ती है। गरीबी बढ़ने की वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रति व्यक्ति आय जैसे प्रमुख क्षेत्रों में शहर पिछड़ जाते हैं। अधिक लोगों के शहरों की तरफ आने से गांवों में किसानों की कमी हो रही है जिससे देश का कृषि क्षेत्रा भी प्रभावित हो रहा है।

कोई भी शहर रहने योग्य तभी हो सकता है, जब वहां सफाई के साथ ही कूड़ा प्रबंधन के बेहतर इंतजाम हों। शहरांे के लिए कूड़ा निस्तारण बड़ी समस्या बनता जा रहा है। खुली जगह में कूड़े के पहाड़ खड़े होते जा रहे हैं। इसी तरह नालियां गायब होती जा रही हैं। बिना नालियों के सड़क बन रही है और जहां नालियां बन रही हैं, उसका ढाल तक सही नहीं होता है और पानी उसमें जमा रहता है जो मच्छर की पैदावार बढ़ाने का प्रमुख कारण है।
उपभोक्तावाद वाली हमारी जीवनशैली बहुत कचरा कर रही है। पानी दूषित होने के साथ बरबादी बढ़ रही है। कोयले से बनी बिजली की खपत बढ़ती जा रही है। येन केन प्रकारेण हमें कचरे के उत्पादन में कमी लानी होगी। कोयले से बनी बिजली पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए हमें कम बिजली खपत वाले उपकरण प्रयोग करने के साथ- साथ अपने घरों की छतों पर सौर ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए सोलर पैनल लगाने चाहिए।
अगर हम देश की राजधानी की बात करें तो यहां स्थानीय प्रशासन के तौर पर तीन- तीन नगर निगम हैं, लेकिन इन सभी की कार्यशैली में सुधार किए जाने की जरूरत है। इनमें से कइयों का सालाना बजट तो छोटे राज्यों के बजट से भी ज्यादा है। लिहाजा, इनके अधिकारियों और कर्मचारियों को जवाबदेह बनाना होगा। रैंकिंग के जो मानक हैं, उनके अनुरूप सुधार सुनिश्चित करना होगा। परिवहन, आवास और प्रदूषण की समस्या को लेकर तो सबसे कारगर योजनाएं तैयार करनी होगी।

-नरेंद्र देवांगन-

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