सरकारी अस्पताल की गलती और जान से हाथ धोना पड़ा गर्भवती बहिन भारती को, मौत जीवन का कटु सत्य है किन्तु कुछ मौतें बुरी तरह झकझोर देती हैं

मौत जीवन का कटु सत्य है किन्तु कुछ मौतें बुरी तरह झकझोर देती हैं, ऐसी ही एक और मौत गर्भवती बहिन भारती उर्फ कृष्णा उम्र 22-23 वर्ष पत्नी विराज रावत ग्राम सैंज हाल निवास सुभाषनगर कर्णप्रयाग की रा. सामु. स्वा. केन्द्र कर्णप्रयाग चमोली में आज दि. 27 जनवरी 2019 को प्रात: 5:00 बजे लगभग हुई, स्मरण रहे कि गर्भवती भारती उर्फ कृष्णा की डिलेवरी जाँच के अनुसार 5 फरवरी 2019 को होनी बतायी गई थी। जिसकी तबियत दि. 24 जनवरी 2019 को सांय 9:00 बजे के लगभग खराब होने लगी, तखलीफ देखकर उसका पति विराज रावत उसे रा. सामु. स्वा. केन्द्र कर्णप्रयाग अपने निजी वाहन से ले गया, हालाँकि अभी गर्भवती भारती उर्फ कृष्णा सुभाषनगर कमरे से गाडी तक और अस्पताल की सीढियों से प्रसूति गृह तक स्वयं चलकर गई थी। अस्पताल में देखरेख व सामान्य उपचार के बाद रात्रि 11:00 बजे लगभग इन्हें वापस कमरे पर भेजा गया कि सब सामान्य है। च्यूँकि डिलेवरी तिथि 5 फरवरी है इसलिए आप वापस चले जाँय। विराज अस्पताल कर्मियों की बात मानकर अपनी गर्भवती पत्नी को वापस कमरे पर ले आये।

रात्रि 3:00 बजे के आसपास फिर गर्भवती भारती की तबियत बिगडनी शुरू हुई, सुबह होने से पूर्व गर्भवती भारती उर्फ कृष्णा बेहोश होने लगी, जिसे फिर दि. 25 जनवरी 2019 को प्रात: 5:00 लगभग 108 की मदद से अस्पताल ले जाया गया। प्रात: डाक्टरी जाँच में बताया गया कि गर्भवती के पेट में बच्चा मर चुका है, बच्चा पेट में मरा कब ये पूछने पर बताया गया कि बच्चा माँ के पेट में दो दिन पूर्व मर चुका है (ऐसा बताया जा रहा है) इस बीच बेहोसी की हालत में ही गर्भवती को बचाने के लिए 11:00 बजे लगभग दिन तक आपरेशन किया गया, किन्तु आपरेशन के बाद मृत्यु तक गर्भवती भारती उर्फ कृष्णा होस में नहीं आ सकी। अफसोश कि प्रसूता दि. 24 जनवरी 2019 को अस्पताल गई जिसे सब ठीक है कहकर वापस भेजा गया फिर अगले ही दिन 25 जनवरी की प्रात: बेहोसी की हालत में अस्पताल पहुँचाई गई जहाँ डाक्टर की जांच में बताया गया कि प्रसूता के गर्भ में जो बच्चा है वह दो दिन पूर्व मर गया आखिर 24 से 25 तारीक के बीच दो दिन कैसे? स्वाभाविक है कि प्रसूता जब अस्पताल गई तो पंजिका में दर्ज किया गया होगा अन्यथा सी.सी.टी.वी. कैमरे तो हैं ही। गर्भवती बहिनों की तडप-तडप कर हो रही मौतों पर दुख व्यक्त करने के शिवाय उत्तराखण्ड के 18 सालों में पहाड को और कुछ नहीं मिला।

……… चुनावों की बातें हों तो एक से बढकर एक जोकर डींगें हांकने लगता है, किन्तु माँ- बहिनों की मौत पर नेता और तंत्र तो क्या गण भी खामोस रहे हैं, इसी खामोसी के बीच अगला नम्बर किसका होगा…….???? बहिन हम अराजक भी आपके काम न आ सके……… आँखें नम हैं…..एक और बहिन का तडप-तडप कर सदा के लिए चले जाना अत्यन्त कष्टकारी है।

-बीरेन्द्र सिंह मिंगवाल-

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