कमजोर रूपये के मुकाबले डाॅलर मजबूत, क्यों और कब तक?

मौजूदा दौर में भारत की मुद्रा ‘रुपए’ के मूल्य में निरन्तर गिरावट देखी जा रही है। आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2018 से जुलाई के महीने तक इसके मूल्य में औसतन आठ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। फिलवक्त निवेशकों को एक डालर खरीदने के लिए 68.90 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। यह पूर्व की सबसे निचली स्थिति 68.80 रुपए प्रति डालर के स्तर से भी नीचे चला गया है।
सवाल है कि ब्रिक्स समूह (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) में रूसी मुद्रा ‘रूबल’ के बाद भारतीय ‘रुपया’ ही है जिसके मूल्य में सबसे ज्यादा गिरावट आई है जो कि चिंता की बात है। इतिहास साक्षी है कि आजादी के बाद भारतीय रुपए का तीन बार अवमूल्यन हुआ है। खास बात यह कि 1947 में डालर और रुपए के बीच में विनिमय दर 1 यूएसडी = 1आईएनआर थी लेकिन आज एक अमेरिकी डालर खरीदने के लिए 68.90 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। सवाल है कि 71 साल में रुपए की कीमत में 69 फीसदी गिरावट के लिए भारत सरकार जिम्मेवार नहीं है तो कौन है?
सवाल है कि फिलवक्त ऐसा क्या बदल गया जिससे भारत की मुद्रा, अमेरिकी डालर सहित अन्य मुद्राओं की तुलना में लगातार कमजोर ही होती जा रही है? इसे समझने के लिए भारत की मुद्रा के मूल्य में हालिया गिरावट के कारणों को जानने की कोशिश करते
हैं:-
प्रथमदृदृष्टया डालर की तुलना में रुपए के मूल्य में कमी के लिए निम्नलिखित कारण जिम्मेदार हैं –
पहला, अमूमन कच्चे तेल के दामों में वृद्धि के चलते भी ऐसा होता है। आपको पता होगा कि भारत अपनी जरुरत का केवल बीस प्रतिशत तेल ही पैदा कर पाता है और बाकी 80 प्रतिशत आयात करता है। यही वजह है कि भारत के आयात बिल में सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के मूल्यों का होता है। एक गहन रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कच्चे तेल की प्रतिदिन की मांग 2018 में वर्ष 2017 की तुलना में दुगुनी यानी कि 190,000 बैरल (1 बैरल =159 लिटर) हो चुकी है जो पिछले वर्ष महज 93,000 बैरल प्रतिदिन थी।
आंकड़े साक्षी हैं कि भारत ने वित्त वर्ष 2016-17 में 213.93 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात किया था जिस पर कुल 70.196 अरब डालर का खर्च आया था लेकिन 2017-18 में इसमें मात्रा 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी जिससे आयात बिल बढ़कर 87.725 अरब डालर पर पहुँच चुका था।
दरअसल, आर्थिक सर्वेक्षण 2018 का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमत में 10 डालर प्रति बैरल की वृद्धि हो जाती है तो इससे भारत की जीडीपी में 0.2-0.3 प्रतिशत की कमी आ जाती है। स्वाभाविक है कि जैसे-जैसे भारत में कच्चे तेल की मांग बढ़ेगी, सरकार का आयात बिल बढ़ता जाएगा। लिहाजा, सरकार को इराक और सऊदी अरब सहित अन्य देशों को डालर में अधिक भुगतान करना पड़ेगा जिससे डालर की मांग बढ़ेगी। फलतः इसकी तुलना में रुपए का मूल्य कम होगा।
दूसरा, अमेरिका-चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध के चलते भी ऐसा हो रहा है। वर्तमान में अमेरिका ने चीन, भारत और यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों के आयातित उत्पादों पर कर बढ़ाने का फैसला लिया है जिसकी प्रतिक्रिया में इन देशों ने भी अमेरिकी उत्पादों पर कर बढ़ा दिया है। लिहाजा, इन उत्पादों की आयातित कीमतें बढ़ना लाजिमी है।
यही वजह है कि भारत द्वारा आयात की जाने वाली वस्तुओं के दाम भी बढ़ चुके हैं जिसके चलते भारत को अधिक डालर भुगतान के रूप में खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि भारत द्वारा डालर की मांग बढ़ रही है, जबकि बाजार में भारतीय रुपए की पूर्ति बढ़ चुकी है। इस कारण से भी डालर के मूल्यों में वृद्धि हो रही है, जबकि रुपए के मूल्यों में तुलनात्मक कमी यानी कि एक डालर को खरीदने के लिए अब ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ेंगे।
तीसरा, भारत का बढ़ता व्यापार घाटा भी एक हद तक इसके लिए जिम्मेवार है। प्रायः जब किसी देश का निर्यात बिल उसके आयात बिल की तुलना में घट जाता है तो इस स्थिति को व्यापार घाटा कहते हैं। आपको पता होना चाहिए कि वित्त वर्ष 2018 में भारत का व्यापार घाटा 156.8 अरब डालर हो गया है जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 105.72 अरब डालर था। स्पष्ट है कि भारत को डालर या अन्य विदेशी मुद्रा में रूप में निर्यात से जितनी आय प्राप्त हो रही है, उससे ज्यादा आयात की गयी वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करनी पड़ रही है। कहने का तात्पर्य यह कि भारत के खजाने, बाजार में डालर कम हो रहे हैं जबकि मांग अधिक है। ‘मांग के नियम’ के मुताबिक, ‘जिस वस्तु की पूर्ति घट जाती है उसकी कीमत बढ़ जाती है।’

चैथा, भारत से पूँजी का बहिर्गमन भी इसका एक प्रमुख कारण है। मसलन, पूंजी का निकास उस दशा को कहते हैं जबकि विदेशी निवेशक या देशीे निवेशक अपना रुपया भारत से निकालकर किसी और देश में निवेश कर देते हैं। बता दें कि जब भारत और विदेश के निवेशक भारत के बाजार से रुपया निकालते हंै तो वे दुनिया में सब जगह समान रूप से स्वीकार की जाने वाली मुद्रा ‘डालर’ में ही निकालते हैं, जिसके कारण भारत में डालर की मांग बढ़ जाती है जिससे इसका मूल्य भी बढ़ जाता है। यही वजह है कि तुलनात्मक रूप से रुपया कमजोर पड़ जाता है।
जहां तक भारत में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की स्थिति का सवाल है तो नेशनल सिक्योरिटीज डिपोजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अप्रैल के अंत तक भारत से 244.44 मिलियन डालर रुपया देश के बाहर चला गया है। देखा जाए तो यह इसी अवधि में पिछले साल की तुलना में 30.78 फीसदी बढ़ा था। स्वाभाविक है कि इससे भी रुपया कमजोर हुआ और डालर की कीमत बढ़ी।
पांचवां, राजनीतिक अस्थिरता का माहौल भी इस स्थिति के लिए ज्यादा जिम्मेवार है। देश के प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह के अलावा किसी प्रधानमंत्राी को 10 साल इस देश पर शासन करने का मौका नहीं मिला। एक अरसे बाद बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी पूरी मजबूती से पीएम बने और आवश्यक सुधारों को तरजीह दी जिससे सकारात्मक माहौल 3 साल तक बना लेकिन चैथे साल में ही उनकी उल्टी गिनती के संकेत मिलने लगे।
हालिया कई सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ रही है कि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता लगातार घटती जा रही है। इससे विदेशी निवेशक कंफ्यूज हो रहे हैं कि अगली बार यही सरकार रहेगी या फिर बदल जाएगी। यदि बदल जाएगी और नई सरकार बनेगी तो विदेशी निवेश की नीतियों में वह किस तरीके का परिवर्तन करेगी, इस बारे में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इसलिए भी विदेशी निवेशक भारत से बेहतर रिटर्न देने वाले देशों में निवेश करने का मन मिजाज बना रहे हैं। फिलहाल वे भारत से अपना धन, डालर के रूप में बाहर ले जा रहे हैं जिसका परिणाम डालर के मूल्यों में वृद्धि और रुपए के मूल्यों में कमी के रूप में दिखाई पड़ रहा है जो कि चिंता की बात है।
बहरहाल, उपर्युक्त निष्कर्षों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इन सभी कारकों के चलते भारतीय मुद्रा की कीमत वर्ष 2018 में 69 रुपए प्रति अमेरिकी डालर के इर्द गिर्द घूम रही है जो चिंता की बात है। भारत सरकार को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे विदेशी मुद्राओं के मुकाबले रुपया हमेशा मजबूत रहे। लिहाजा, हम उम्मीद करते हैं कि सरकार जल्दी ही रिजर्व बैंक की सहायता से इस दिशा में आवश्यक कदम उठाएगी जिससे रुपए की कीमत में दिखाई पड़ रही कमी जल्दी ही थम जाएगी।

-कमलेश पांडे-

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