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मानवीय समझ का प्रकाश फैलाये शिक्षा
 

अविजीत पाठक

हाल ही में 'संसद टीवी' चैनल को दिए एक साक्षात्कार में गृह मंत्री अमित शाह ने व्यथा प्रकट करते हुए कहा, 'अनपढ़ व्यक्ति कभी भी भारत का एक अच्छा नागरिक नहीं बन सकता। उनके मुताबिक, एक अशिक्षित इनसान देश पर बोझ है क्योंकि न तो उसे संविधान द्वारा खुद को मिले अधिकारों का भान होता है और न ही उन फर्जों का, जो अपेक्षित हैं। प्रथम दृष्टया भले ही इस किस्म के वक्तव्य से यह आभास बनता हो कि मंत्री महोदय शिक्षा और ज्ञान के आलोक को काफी महत्व दे रहे हैं और साक्षर एवं जागृत नागरिक बनाने के लिए शिक्षा संस्थानों का नेटवर्क बढ़ाने की जरूरत गिना रहे हैं। तथापि यदि हम गहराई से विचार करने का साहस करें तो इस सारे विषय पर जिस तरीके का नजरिया उनका है, उसमें गंभीर समस्या को बूझ पाना असंभव नहीं है।

एक अशिक्षित व्यक्ति को बोझ मानना गलत है। ऐसा कहना, उसकी आत्मा और इनसानियत को नकारना है। एक भूमिहीन किसान, मछुआरा, रेहड़ी वाला, भवन निर्माण श्रमिक-दूसरे शब्दों में कहें तो एक अनपढ़ मातहत-बेशक ये लोग संविधान की धाराओं से अनभिज्ञ हों, न ही मूल अधिकारों और निर्देशों-सिद्धांतों पर भाषण देने लायक हों, लेकिन इतना जरूर है कि वे उन 'जानकारों जैसे नहीं हैं, जो घातक किस्म के चालाक, राजनीतिक एवं नैतिक रूप से गैर जिम्मेवाराना हैं। आमतौर पर ये लोग कठोर परिश्रम करने वाले हैं और बिना किसी को तंग करे, जैसे भी हो, गुजर-बसर कर लेते हैं। हम उन आधारभूत समस्याओं से मुंह नहीं मोड़ सकते जो हमारे समाज के सामने मुंह बाए खड़ी हैं। जैसे कि निष्ठुर असमानता, वर्णीय ऊंच-नीच और दबाने वाला समाज, जिसमें अमीरों को विशेषाधिकार प्राप्त हैं और जो आगे अनवरत सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी पैदा करता जा रहा है। किसी को भी गरीब होना पसंद नहीं है और न ही बंधुआ मज़दूर बनने में मजा आता है या फिर घरविहीन होना, न ही कोई तमाम तरह के अभिशापों से भरा जीवन जीना चाहेगा।
असल बोझ है पितृ सत्तात्मक-जाति-वर्ण-सामंती मानसिकता के घालमेल से बना तंत्र और उभरता नवउदारवादी पूंजीवाद, यह मिलकर भोंडी प्रचुरता के बीच पैदा करते हैं भूख और कुपोषण, अमीरों के लिए बने अंतर्राष्ट्रीय विद्यालयों के बीच बाल-मजदूर और यही विद्रूपता दलितों, महिलाओं और हाशिए पर आने वाले अन्य वंचित वर्गों को हतोत्साहित करती है। पढ़ाई की 'मुख्यधारा पद्धति, जो आज शिक्षण क्षेत्र में हावी है, वह गरीब को दरपेश मुश्किलों के प्रति असंवेदनशील है। अन्य शब्दों में, गृह मंत्री ने तंत्र-ढांचे में व्याप्त कमियों पर सवाल उठाने के बजाय इल्जाम अशिक्षितों पर डाल दिया है। यह करना आसान है, क्योंकि ताकतवर से जवाबतलबी करने को अलग किस्म की अंतर्दृष्टि और साहस की जरूरत होती है।

फिर, अमित शाह ने एक अन्य बुनियादी सवाल पूछने की जहमत नहीं उठाई, अर्थात 'शिक्षा है क्या? जहां एक ओर अनपढ़ता का महिमामंडन करने या समर्थन करने की कोई वजह नहीं है, वहीं हम लोग, जो खुद को विशेषाधिकारयुक्त, साक्षर और पढ़े-लिखे कहलवाते हैं, क्या कर रहे हैं? अगर अपने आसपास देखें और इस तथ्य को मानना गवारा करें कि हम जैसे, जो विश्वविद्यालयों से शिक्षित हैं, तकनीकी कौशल युक्त एवं आर्थिक रूप से गतिशील हैं-जरूरी नहीं कि सब पवित्र आत्माएं हों, जो संवैधानिक सिद्धांतों की भावनानुसार चलने वाली और परोपकारी हैं। हम में से बहुतेरे, बेलगाम उपभोक्तावाद से ग्रस्त हैं, दहेज-रिश्वत कबूल करने में नहीं झिझकते, घोटालों और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, प्रकृति से खिलवाड़ करके इसको नष्ट करते हैं, निगरानी और युद्धोन्माद पैदा करने की साजिशें रचते हैं, आयकर न चुकाने के रास्ते खोजते हैं, ज़हर उगलने वाले खबरिया चैनलों के फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले एंकरों से अभिभूत हो बह उठते हैं, अपने घरेलू नौकरों का शोषण करते हैं, अपने बच्चों को देश छोड़कर बेहतर संभावना वाले यूरोप-अमेरिका में जा बसने को उत्साहित करते हैं, आदर्शवाद से ओतप्रोत युवाओं को जेल में डाल देते हैं। शाह साहब को अधिक गहरे में उतरने की जरूरत है, यह अहसास करना कि तथाकथित शिक्षित या औपचारिक शिक्षा युक्त होना यानी पढ़ाई में स्वर्ण पदक विजेता अथवा कक्षा में अव्वल होने का मतलब जरूरी नहीं कि वह संविधान में बताए आदर्शों का पालन करने में भी दृढ़निश्चयी हो जाएगा, और ऐसी जिंदगी जीने लगेगा, जिससे मानवीय समझ का प्रकाश फैलता हो। इसके बजाय, शिक्षा के नाम पर ज्यादातर हम लोग केवल साजिशकारी और मशीनी बुद्धि पैदा कर रहे हैं, जिसका प्रेम-स्नेह-न्याय युक्त दुनिया रचने के लिए आवश्यक संयुक्त जिम्मेवारी वाले अहसास से कुछ लेना-देना नहीं है। क्या हमारे लिए यह संभव है कि आईआईटी या आईआईएम से पढ़कर निकले युवा जो फाटक के पीछे सुरक्षित और आलीशान परिसरों में रहते और बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में काम करते हैं-इनको वैसे सपने सच में देखना अच्छा लगेगा जैसे कभी गांधी, अंबेडकर और भगत सिंह ने देश निर्माण हेतु संजोए थे। क्या अमित शाह के लिए यह संभव है कि उन नामी वकीलों की शुचिता पर सवाल उठाएं, जो पैंतरों वाले कौशल का इस्तेमाल कर झूठ को सच बनाते या अदालतों में जुर्म के स्याह रंग को निर्दोषता की सफेदी में तबदील कर डालते हैं? या क्या शाह साहब के लिए संभव है उन आईएएस-आईपीएस अधिकारियों से जवाबतलबी करना, जो संविधान को ताक पर रखकर स्थानीय विधायक, सांसद या मंत्री की मनमर्जी के सामने समर्पण कर देते हैं?

यदि उनके दिल में वाकई अनपढ़ों के लिए दर्द है तो उन्हें शिक्षा के स्वरूप में सुधार करना चाहिए। यह मामला शिक्षण संस्थानों के हाजरी रजिस्टरों का आंकड़ा गिनवाने से कहीं अलग है, न ही प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धियों का महिमामंडन करते विज्ञापनों जैसा है। बल्कि उन्हें अहसास होना चाहिए कि शिक्षा का मतलब यह नहीं कि एक बच्चा भर्ती हो गया, एक बहुत कम वेतन लेने वाले या अकल्पनाशील अध्यापक से पढ़कर रट्टू तोता बन जाए, जिसके लिए 'ए' से एप्पल' और 'क्यू से क्वीन' हो या फिर राष्ट्रभक्ति का पर्याय 'जय श्रीराम' का नारा लगाना हो। एक बंधन मुक्त शिक्षा देने के लिए जरूरी है पाओले फ्रेरे की सुझाई 'पेडागॉगी ऑफ द ऑप्रेस्ड' (वंचित बच्चे की मनोस्थिति के मुताबिक शिक्षा) अर्थात सीखने का वह तरीका जो बच्चे की अंदरूनी इनसानियत, प्रतिक्रियात्मकता और रचनाशीलता का सम्मान करती हो, या पढ़ाने का वह ढंग जो उसे मौजूदा व्यवस्था पर सवाल करने लायक बनाए। दूसरे शब्दों में, मुक्त शिक्षा हर गांव और झुग्गी बस्ती में जीवंत विद्यालयों और पढ़ाने की ललक लिए शिक्षक समुदाय के बिना संभव नहीं है और इसके लिए जरूरी है राजनीतिक जागृति और रूहानियत से परिपूर्ण अध्यापकों या राह दिखाने वालों की, जिसकी वजह से समुदाय उनका आदर करे, जो गरीबों और शोषितों को हिकारत से देखने के बजाय उनके साथ संवाद करें, उन्हें संभावना मानकर प्यार से पढ़ाए, उनमें छिपी क्षमता को पहचान कर तराशे और उस संस्कृति पर सवाल उठाने लायक बनने को बढ़ावा दे, जो असमानता, सामाजिक ऊंच-नीच, आत्मुग्धता भरे वर्ग और आर्थिक शोषण को बढ़ावा देने वाली है।
क्या अमित शाह इस संभावना पर विचार करने को तैयार हैं? या फिर उनसे यह उम्मीद करना बहुत ज्यादा है?
लेखक समाजशास्त्री हैं।