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सेना को वक्त की चाल में ढालेगी समृद्ध विरासत
 

ले. जनरल प्रदीप बाली (अप्र)

जनरल बिपिन रावत 8 दिसम्बर को इतिहास के नायकों में शामिल हो गए। बतौर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और पूर्व सेनाध्यक्ष रहते, वे सैन्य बलों की सोच और ढांचे में परिवर्तन का प्रतीक बने, जिसका वह नेतृत्व कर रहे थे। देश के पहले सीडीएस का व्यथित करने वाला निधन बहुत बड़ा हादसा है, तथापि उनके द्वारा शुरू आधुनिकीकरण की प्रक्रिया और सेना के तीनों अंगों की संयुक्त कमान तंत्र बनाने का काम जारी रहेगा। आधिकारिक और निजी तौर पर उनको पास से जानने की वजह से मैं उनकी विलक्षण खूबियों और पीछे छोड़ी विरासत पर रोशनी डालना चाहूंगा।

जनरल बिपिन रावत पूर्व उप-सेनाध्यक्ष ले. जनरल लक्ष्मण सिंह रावत के पुत्र थे, वर्दी में उन्होंने अपने करिअर को सर्वोच्च ऊंचाइयों पर पहुंचाया। जिसकी शुरुआत सोर्ड ऑफ ऑनर पाने से हुई, जो भारतीय सैनिक अकादमी में सब विषयों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जेंटलमैन कैडेट को सेना में कमीशन प्राप्त करने वाले समारोह में प्रदान की जाती है। प्रशिक्षण के सभी महत्वपूर्ण कोर्सों में खास मुकाम पाने और पढ़ाई में डॉक्टरेट स्तर की योग्यता पाने वाले बिपिन रावत ने थल सेना की विभिन्न वाहिनियों में काम करते हुए, जिनमें कुछ तैनातियां सबसे विकट एवं चुनौतीपूर्ण जगहों पर थीं, अपने नेतृत्व और सैन्य माद्दे का लोहा मनवाया। उन्होंने कांगों में संयुक्त राष्ट्र बल में भारत की ओर से तैनात ब्रिगेड ग्रुप का नेतृत्व भी किया था। इन नियुक्तियों में जो विशेषता उन्हें औरों से जुदा करती है, वह है किसी भी परिस्थिति को तुरंत आंकना और उस पर काबू पाने की क्षमता, अपने जवानों की अगुवाई करने वाले किसी में यह खूबी होना नितांत जरूरी है।

उच्च स्तर पर उनके सैन्य नेतृत्व क्षमता की बात करें, तो वह ऐसे नायक थे जो जरूरत आन पडऩे पर निर्णय लेते और उसे अंतिम ध्येय तक पहुंचाते थे। उनके नेतृत्व में मैंने एक वाहिनी (कोर) की अगुवाई की है, एक बार उन्हें यकीन हो जाए कि चुनी गई डगर सही है, तो चाहे कुछ हो जाए, मंजिल पाने को उनकी निर्णायक प्रतिबद्धता की कोई भी कसम उठा सकता है। उनके विलक्षण गुणों में एक यह भी था कि किसी प्रस्ताव को सुनते वक्त या पेश की गई प्रस्तुति के वक्त अपना ध्यान केंद्रित रखते हुए दोगुणी तेजी से फैसला लेना। हमारी पूरी सीमा रेखा पर तमाम दुरूह जगहों पर खुद तैनात रह चुके जनरल रावत के ज़हन में दूरस्थ इलाकों में फर्ज निभा रहे जवानों और फील्ड कमांडरों का ध्यान बना रहता था।

सितम्बर, 2016 में जनरल रावत सेना मुख्यालय में बतौर उप-सेनाध्यक्ष नियुक्त होकर आए थे और महत्वपूर्ण दफ्तरी कामकाज में जिस तरह तुरंत बदलाव आया, वह देखते बनता था। सभी मातहतों की अपने तक पहुंच आसान बनाकर और जटिल विषयों को तन्मयता से सुलझाने के उनके विशिष्ट तरीके ने बहुत बड़ा फर्क लाया। बतौर डायरेक्टर जनरल ऑफ पर्सपेक्टिव प्लानिंग का मुखिया रहते मुझे भविष्य के पर्सपेक्टिव प्लान पर उनका सकारात्मक दखल आज भी याद है। उनमें किसी की बात सुनने की सहनशीलता गजब की थी और व्यवहार अधिकांशत: मिलनसार था। लेकिन मजाल है कोई विषय उनकी प्रबुद्ध परख से गुजरे बिना रह जाए।
जनवरी, 2017 में सेनाध्यक्ष का पद संभालने के बाद मानेकशॉ सभागार में होने वाले रिवायती पत्रकार वार्ता वाले क्षण परिभाषित करने वाले थे। संवाद बेलाग था और यह एकदम साफ हो गया था कि अब ऐसा सेनाध्यक्ष है, जो अपनी धारणा पर अडिग है, जरूरत पडऩे पर कडक़ होने से नहीं टलेगा और अपने मन की बात सीधे और बेधडक़ होकर कहने में हिचकेगा नहीं। सेना का आधुनिकीकरण और तंत्र की पुनर्संरचना को आकार देने और मार्गदर्शन में उनके दूरदृष्टिपूर्ण गुण सदा आगे रहे।

अब देश का ऐसा सेनाध्यक्ष भी था, जिसे सही को सही और गलत को गलत कहने में कोई गुरेज नहीं था और जो गलत आचरण की गुंजाइश देने वाले तौर-तरीके बदलने को सुधारों का हामी था। वैसे तो इतने उच्च पद पर आसीन किसी व्यक्ति से शुचिता की उम्मीद सबको रहती है, लेकिन उनके आने पर यह बात एकदम साफ हो गई थी कि किसी प्रकार की नैतिक अथवा वित्तीय गड़बड़ी के प्रति सहनशीलता शून्य है। सुरक्षा बलों में सद्चरित्र बनाने की दिशा में सेनाप्रमुख की यह विशेषता काफी गहरे तक असरअंदाज होती है। हो सकता है उनका यह अंदाज़ कुछ असंतुष्ट तत्वों-सेवारत और सेवानिवृत्त को रास न आया हो और उन्होंने पर्दे के पीछे रहते हुए सोशल मीडिया को अपनी बेजा भड़ास निकालने का जरिया बनाया। तथापि जनरल रावत ऐसे बंदे नहीं थे जो ऐसे किसी दुष्प्रचार से डिग जाते।

जब डोकलाम संकट जोरों पर था, तब जनरल रावत की निगरानी में मुझे सिक्किम स्थित 33 कोर की कमान सौंपी गई। अपने स्टाइल के अनुरूप उन्होंने करारे और स्पष्ट शब्दों में कहा ‘तुम्हें भागते घोड़े पर सवार होना है’, हालांकि जो उन्होंने नहीं कहा किंतु शारीरिक भंगिमा व्यक्त कर रही थी ‘और मुझे तुम पर यकीन है’। यही वह विशिष्ट खासियत है जो जनरल रावत को न केवल एक फौजी का जनरल बल्कि कमांडर का जनरल भी बनाती है! उस मौके पर मुझे उनके अंदर वह क्षमता देखने को मिली जो फील्ड में तैनात कोर कमांडर को स्पष्ट निर्देश भी देती है और उसका हाथ भी मजबूत करती है।
जनरल रावत महत्वपूर्ण सैन्य मामलों पर विमर्श, चाहे विषय कार्यकारी हो या प्रशासनिक, में शामिल किसी को भी अपने खोजपूर्ण और तीखे सवालों से निढाल कर देते थे। लेकिन एक बार यकीन होने के बाद संगठनात्मक हितों को सबसे आगे रखकर लिए उनके निर्णय एकदम सुस्पष्ट हुआ करते थे।

नियति ने उनके लिए और बहुत कुछ तय कर रखा था, जब देश के पहले सीडीएस का ऊंचा ओहदा मिला। उनके करिअर ग्राफ, दिमागी और दिली खूबियों को देखते हुए इस कष्टसाध्य नियुक्ति के लिए कोई और उनसे बेहतर पात्र था भी नहीं। यहां फिर, जनरल रावत ने सम्मुख चुनौतियों और लंबित कार्य पर पकड़ बनाई। सशस्त्र बलों के लिए युद्धक व्यूह-तंत्र की पुनर्संचरना की खातिर मिशनरी लगन होना वक्त का तकाज़ा था और पिछले दो सालों से इस दिशा में उनके अनवरत प्रयासों से काफी हासिल हुआ है। बहुत जल्द थल-नभ-वायुसेना की संयुक्त कमान का वजूद एक हकीकत होगी और जनरल रावत की विरासत इसके जरिए जिंदा रहेगी। भारत ने एक महान योद्धा और सबसे वरिष्ठ सैन्य कमांडर खोया है, लेकिन उनकी गाथा प्रेरणा का स्रोत और दृष्टिकोण सशस्त्र बलों के तंत्र-आधुनिकीकरण के रूप में अमर रहेगा।
लेखक सिक्किम स्थित 33वीं कोर के कमांडर रहे हैं।