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उत्तराखंड में विधान परिषद की कवायद!
 

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट  

उत्तराखंड के सर्वमान्य नेता हरीश रावत ने 70 विधानसभा सीटों के राज्य उत्तराखंड में 21 सीटों वाली विधान परिषद गठित करने की मंशा जाहिर की है,ताकि उत्तराखंड में राज्य के जन्म के बाद से व्याप्त राजनीतिक अस्थिरता को रोका जा सके।उन्होंने राज्य गठन के बाद से ही इसकी सम्भावनाओ पर अपने विचार व्यक्त किए थे,लेकिन सत्ता नेतृत्व में कम से रह पाने के कारण उनका यह सपना अभी तक साकार नही हो पाया है।अब सन 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता प्राप्त करती है तो राज्य में विधान परिषद का गठन हो सकता है।अविभाजित उत्तरप्रदेश के समय पर्वतीय क्षेत्र  की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा होने मे आ रहे अवरोधों से निजात पाने के लिए ही उत्तराखंड राज्य बना है। फिर भी पिछले 21 सालों में पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षित जनता की उम्मीदों-आकांक्षाओं की पूर्ति नही हो पाई।अलबत्ता  राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के पंख खूब लगे और जो लोग ग्राम प्रधान बनने लायक नही थे ,वे विधानसभा तक पहुंचने में कामयाब हो गए।अधिकारियों की प्रोन्नति भी पंख लगने जैसी ही हुई।

अब 21 साल बाद एक बार फिर विधानसभा चुनाव से पूर्व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में राजनीतिक अस्थिरता को दूर करने के लिए  21 सदस्यीय विधान परिषद गठन का सुझाव राज्य के सामने प्रस्तुत किया है। हरीश रावत सन 2002 में भी विधान परिषद के गठन का विचार दिया था।लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी उक्त मुद्दे पर मौन रहे।इसी कारण राज्य में उस समय विधान परिषद नही बन सकती।भाजपा की तो इस ओर इच्छा शक्ति कभी रही ही नही। क्या वाकई विधान परिषद बनाने से राजनीतिक अस्थिरता रुक जाएगी और विकास का पहिया तेज चलने लगेगा? या फिर विधान परिषद के गठन का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि राजनीतिक दलों के जो नेता विधायक बनने से रह गए या कहीं एडजेस्ट होने से रह गए,उन  नेताओं के लिए विधान परिषद बनेगी?
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना हैं कि  उत्तराखंड जैसे राज्य में 12 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं लेकिन राज्य में विभाग बड़े राज्यों की तरह ही सारे के सारे होते हैं। ज्यादा विभाग तुलनात्मक रूप से कम मंत्रियों को संभालने पड़ते हैं जिससे जनता के विकास की गाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।

वास्तव में सियासत की अति महत्वाकांक्षाओं ने सूबे के हालात बदतर कर डाले है।एक ही सत्र में तीन तीन मुख्यमंत्रियों का बदलना राज्य के विकास को डुबो रहा है।तभी तो मात्र बीस साल में 11वे मुख्यमंत्री  राज्य पर थोप दिए गए।नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और एक-दूसरे को गिराकर हर हाल में सत्ता हथियाने के सियासी षड्यंत्रों ने  जनता को अस्थिरता दी है। विधान परिषद के प्रस्ताव पर हरीश रावत के ही शब्दों में उनके विचार,"एक बिंदु विचारार्थ बार-बार मेरे मन में आता है कि उत्तराखंड में राजनैतिक स्थिरता कैसे रहे! राजनैतिक दलों में आंतरिक संतुलन और स्थिरता कैसे पैदा हो! जब स्थिरता नहीं होती है तो विकास नहीं होता है, केवल बातें होती हैं। मैं पिछले 21 साल के इतिहास को यदि देखता हूँ तो मुझे लगता है कि उत्तराखंड के अंदर राजनैतिक अस्थिरता पहले दिन से ही हावी है। उत्तराखंड में प्रत्येक राजनैतिक दल में इतने लोग हैं कि सबको समन्वित कर चलना उनके लिये कठिन है और कांग्रेस व भाजपा जैसे पार्टियों के लिए तो यह कठिनतर होता जा रहा है। केंद्र सरकार का यह निर्णय कि राज्य में गठित होने वाले मंत्रिमंडल की संख्या कितनी हो, उससे छोटे राज्यों के सामने और ज्यादा दिक्कत पैदा होनी है। अब उत्तराखंड जैसे राज्यों में मंत्री 12 बनाए जा सकते है, मगर विभाग तो सारे हैं जो बड़े राज्यों में है, सचिव भी उतने ही हैं जितने सब राज्यों में हैं।

मगर एक-एक मंत्री, कई-2 विभागों को संभालते हैं, किसी में उनकी रूचि कम हो जाती है तो किसी में ज्यादा हो जाती है और छोटे विभागों पर मंत्रियों का फोकस नहीं रहता है और उससे जो छोटे विभाग हैं उनकी ग्रोथ पर विपरीत असर पड़ रहा है, जबकि प्रशासन का छोटे से छोटा विभाग भी जनकल्याण के लिए बहुत उपयोगी होता है तो मैंने कई दृष्टिकोण से सोचा और मैंने पाया कि उत्तराखंड जैसे राज्य के अंदर हमें कोई न कोई रास्ता ऐसा निकलना पड़ेगा, जिस रास्ते से राजनैतिक दल चाहे वो सत्तारूढ़ हो या विपक्ष हो उसमें राजनैतिक स्थिरता रहे और एक परिपक्व राजनैतिक धारा राज्य के अंदर विकसित हो सके और एक निश्चित सोच के आधार पर वो राजनैतिक दल आगे प्रशासनिक व्यवस्था और विकास का संचालन करें। यहां मेरे मन में एक ख्याल और आता है, क्योंकि तत्कालिक संघर्ष से निकले हुये लोगों के साथ बातचीत कर मैंने कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में 2002 में विधान परिषद का गठन का वादा किया था, तो कालांतर में कतिपय कारणों के कारण गठित नहीं हो पाई और उसके बाद के जो अनुभव रहे हैं, वो अनुभव कई दृष्टिकोणों से राज्य के हित में नहीं रहे हैं। इसलिये मैं समझता हूँ कि फिर से इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता पड़ रही है कि विधान परिषद होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए! और मैं समझता हूंँ 21 सदस्यीय विधान परिषद उपयोगिता के दृष्टिकोण से उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए बहुत लाभदायी हो सकती है, राजनैतिक स्थिरता पैदा करने वाला कारक बन सकती है। "निश्चित रूप से हरीश रावत के प्रस्ताव पर उत्तराखंड की आम जनता व राजनीतिक दलों को गम्भीरता पूर्वक विचार विमर्श करना चाहिए और यदि ऐसा होना राज्य हित मे समझते है ,तो फिर विधान परिषद गठन में कोई दलगत बाधा खड़ी न की जाए।