पूर्वांचल में स्थानीय मुद्दे बिगाड़ रहे हैं भाजपा का खेल

सातवें चरण में पूर्वांचल की 13 सीटों पर होने वाले मतदान के लिए जारी चुनाव प्रचार में भले ही जनता के मुद्दे नेताओं के भाषणों से नदारद हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। दरअसल, पूर्वांचल की जनता की नजर में बेलगाम महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी, किसानों की बदहाली और महिलाओं के प्रति लगातार बढ़ती हिंसा अहम चुनावी मुद्दे हैं और वो आगामी 19 मई को होने वाले चुनाव में कमोबेश इन्हीं मुद्दों के आधार पर मतदान करेंगे। यदि ऐसा हुआ तो पूर्वांचल में इस बार भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

भाजपा का गढ़ माने जाने वाले गाजीपुर, देवरिया, वाराणसी, गोरखपुर जैसे संसदीय क्षेत्रों में भी जनता अपने सांसद से पांच साल के विकास कार्यों का हिसाब-किताब मांग रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में गठबंधन और कांग्रेस प्रत्याशी ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी है। दोनों की दलों के उम्मीदवार जनता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच साल के कार्य का लेखा-जोखा रख रहे हैं। इन सबसे अलग चंदौली, महाराजगंज, कुशी नगर, बांस गांव, घोषी आदि में जातीय समीकरण के आगे सारे मुद्दे बेबस नजर आ रहे हैं। पूर्वांचल की चंदौली, गाजीपुर, बलिया लोकसभा सीट पर जन अधिकार पार्टी और कांग्रेस गठबंधन से बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में केंद्रीय राज्यमंत्री मनोज सिन्हा और महेन्द्रनाथ पाण्डे की सीट भी फंसती दिख रही है।

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चंदौली लोकसभा सीट हमेशा कुशवाहा जाति के अनुकूल रही है। इस लोकसभा सीट से 5 बार कुशवाहा उम्मीदवार जीत दर्ज कर चुके हैं। पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में बसपा से अनिल मौर्य ढाई लाख वोट पाकर रनर रहे थे, महेन्द्रनाथ पाण्डे चार लाख से अधिक मत पाकर विजयी हुए थे और सपा यहां तीसरे स्थान पर थी। इस बार कांग्रेस, जन अधिकार पार्टी और अपना दल के गठबंधन होने से यहां समीकरण बिल्कुल बदल गया है। इस गठबंधन की संयुक्त प्रत्याशी शिवकन्या कुशवाहा भाजपा और गठबंधन प्रत्याशी पर भारी पड़ रही हैं। जन अधिकार पार्टी के संस्थापक एवं पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा इस लोकसभा में मौर्य एवं कुशवाहा वोटों को खासा प्रभावित कर रहे हैं।

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