हवा में ही रह गए ‘स्किल के अनुरूप काम के’ सरकारी दावे… नैनीताल में मज़दूरी कर रहे हैं बीए-एमए पास

नैनीताल में हालत यह है कि बीए, एमए शिक्षित बेरोज़गार पत्थर तोड़कर अपना जीवन चला रहे हैं. उधर नाव टैक्सी चालक भी जमापूंजी खर्च कर अब गांव-गांव मज़दूरी खोज रहे हैं।
पर्यटन चौपट होने से नाव, टैक्सी चालक भी मज़दूरी खोज रहे हैं. अब को इन लोगों की सरकार से उम्मीद भी टूटने लगी है।

नैनीताल। कोरोना काल में महानगरों से रिवर्स पलायन हुआ तो पहाड़ में भी पर्यटन से कई लोगों के रोजगार चले गए। होने को सरकार ने पहाड़ में स्वरोज़गार के साथ स्किल के हिसाब से काम देने की योजना बनाई है लेकिन धरातल पर इन दावों की पोल खुल रही है। पहाड़ में हालत यह है कि बीए, एमए शिक्षित बेरोज़गार पत्थर तोड़कर अपना जीवन चला रहे हैं। पर्यटन चौपट होने से नाव, टैक्सी चालक भी जमापूंजी खर्च कर अब गांव-गांव मज़दूरी खोज रहे हैं। अब को इन लोगों की सरकार से उम्मीद भी टूटने लगी है।

पत्थर तोड़ रहे ग्रेजुएट

नैनीताल गांजा गांव के वसीम ने ग्रेजुएशन किया है और कोरोना के बाद पहाड़ में पत्थर तोड़ रहे हैं। सिर्फ़ वसीम ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के इस गांव में रहने वाले पॉलिटेक्निक छात्र सुहैल भी रोज़ाना पत्थर तोड़ने के साथ गांव के पास ही मजदूरी कर रहे हैं। सिर्फ यही दोनों नहीं बल्कि गांव के सभी पढ़े लिखे युवा रोज़ाना गांव गांव जाकर काम खोज रहे हैं तो दिहाड़ी मजदूरी से मिलने वाले 400 रुपये से अपना घर चला रहे हैं।

ग्रेजुएट मज़दूर वसीम कहते हैं कि उनका गांव अल्पसंख्यक होने के बाद भी सरकारी योजनाएं यहां तक नहीं आतीं। कोरोना काल में बेरोज़गार घूम रहे हैं। हांलाकि अब मज़दूरी ज़रूर मिली है लेकिन अभी तक उनके स्किल के हिसाब से उनको काम नहीं मिल सका है। सुहैल कहते हैं कि वह पाँलिटेक्निक कर मजबूरी में यह काम घर चलाने के लिए कर रहे हैं। अगर सरकार स्किल के हिसाब से काम देती तो उनको ऐसा काम नहीं करना पड़ता और कहीं, कुछ और काम कर रहे होते।

सब बने मज़दूर

पहाड़ों में घर चलाने के लिए मज़दूरी कर रहे कुछ युवाओं ने न्यूज़ 18 से बातचीत में बताया कि वे नैनीताल में टैक्सी चलाते थे और पर्यटन कारोबार में अच्छा खासा पैसा कमाते थे लेकिन लॉकडाउन में सारा पैसा खत्म हो गया अब घर चलाने के लिए उन्होंने यह काम चुना है।

युसुफ कहते हैं कि वह नाव के मालिक हैं और नैनीताल में टूरिस्ट सीज़न में पैसा भी कमा लेते हैं लेकिन 5 महीने से खाली हैं. पर्यटकों के न आ पाने की वजह से घर चलाना मुश्किल हो गया है. युसुफ कहते हैं कि पिछले दिनों उन्हौने अपने घर के जेवर भी बेचे लेकिन हालात नहीं सुधरे। अब जाकर काम मिला है।

दिल्ली से लौटे प्रवासी ईश्वर बोरा का कहना है कि कोरोना के बाद उनकी नौकरी छूट गई। घर आए तो काम मिला नहीं। स्किल के हिसाब से काम के लिए सरकारी अधिकारियों से कोई बात नहीं हो सकी इसलिए अब वह मजदूरी कर रहे हैं और अपना खर्चा चला रहे हैं।

सरकार का वादा

दरअसल कोरोना संक्रमण फैलने के बाद महानगरों से रिवर्स पलायन पहाड़ में हुआ तो पहाड़ में भी कई लोग बेरोज़गार हो गए। सरकार ने दावा किया कि इन लोगों को मनरेगा में काम दिया जाएगा साथ ही स्वरोज़गार और स्किल के अनुसार काम देंगे। हालांकि सरकार ने 150 तरह के काम का खाका तैयार भी किया लेकिन इन लोगों को काम मिलना तो दूर योजनाओं की जानकारी भी नहीं मिल सकी है।

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