आखिर कब तक जंगली जानवरों के आतंक के साये में डर डरकर जीयेगे पहाड़ के निवासी

उत्तराखण्ड के पहाड़ों में रहने वाले हम पहाड़ के लोगों का जीवन जितना शहर में रहकर आसान लगता है, वह उतना आसान नहीं हैं। हर रोज खतरे के साये में जीते हैं, हम पहाड़ी लोग। पहाड़ में यदि कोई आजीविका के लिए खेती करता है तो उसे जंगली जानवर खा जाते हैं, जानवर पालता है तो उसे जंगली जानवर अपना निवाला बना लेते हैं, पर्यटन के क्षेत्र में कार्य करना चाहे तो सड़के नहीं, पानी नहीं, मेडिकल सुविधा नहीं, तो फिर वह कैसे करके कोई वहॉ कोई अपनी आजिविका का उपार्जन कर सके। पहाड़ो में हम लोगों को हर मुसिबतों का सामना हर पल करना पड़ता है। आज दो घटनाओं ने फिर मेरी कलम को उठाने के लिए मजबूर कर दिया। आज सोशल मीडिया के माध्यम से दो सच्ची घटनाओं ने मुझे इसलिए झकझोरा कि क्या हम बस परिस्थितियों और काश ऐसा ना होता के भरोसे पर कब तक अपने आपको समझाते रहेगें।

यमकेश्वर प्रखण्ड के लक्ष्मणझूला काण्डी रोड़ पर सटे और उससे कुछ दूरी पर गॉव में एक अज्ञात जानवर द्वारा गॉव की मवेशियों को अपना शिकार बनाया जा रहा है, यह जानवर पिछले दो तीन साल से इस तरह की घटना का अंजाम दे रहा है, जिस कारण क्षेत्र के निवासी दहशत में जी रहे हैं। आज दोपहर में बूंगा गॉव के आसपास के घसेरियों ने बताया कि जंगल में अज्ञात जानवर द्वारा घास का एक घर बनाया हुआ है, जिसे बूंगा क्षेत्र पंचायत सदस्य, श्री सुदेश भट्ट, श्री क्रान्ति कपरवाण, जिला पंचायत सदस्य भादसी, श्री विपिन पेटवाल, श्री शांति प्रसाद भट्ट, यूकेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने जंगल में जाकर उस जानवर की तहकीकात करने की कोशिश करी। अहम बात यह है कि यह जानवर जो क्षेत्र में लोगों की आय और जीविका का मुख्य साधन गाय को मार कर उन्हें अपना निवाला बना रहा है। फल्दाकोट, बिनक, तौलसारी, बूंगा आदि गॉव में मवेशियों को रात में छानी से पटाल निकालकर अंदर घूसता है और कंधे के ऊपर से मांस को अपने नाखूनों से उधेड रहा है, लोगों को मवेशियों के साथ अपना जीवन भी संकटमय लग रहा है, जिस कारण लोग सूरज ढलने के बाद घर से बाहर निकलने से भी डर रहे हैं। इस संबंध में क्षेत्रीय जागरूक लोगों ने वन विभाग को सूचित भी किया लेकिन अभी तक इस अज्ञात जानवर का पता लगाने की कोशिश तक नहीं की है।

वहीं दूसरी घटना मेरे पडौस के गॉव तल्ला बणास का राजस्व ग्राम खैराणा निवासी श्रीमती कांती देवी की बकरी को आज बाघ ने अपना निवाला बना दिया, गाय बकरियां ही आजीविका का प्रमुख साधन हैं, लेकिन उसी आजिविका को बाघ ने उनसे छीन लिया। जैसा कि बताया जा रहा है कि कांति देवी ने वह बकरी किसी से उधार मॉग कर उसे खरीद कर लायी थी, जिसे बेचकर उसका चुकता करती लेकिन बाघ ने अपने स्वभाव के चलते उसे अपना ग्रास बना दिया। जंगली जानवर का स्वभाव शिकार करना है, वह करेगा लेकिन सवाल यह है कि इन जंगली जानवरों से आम आदमी अपनी सुरक्षा कैसे करे। वन विभाग का दायित्व है कि जिस तरह जंगली जानवरों के लिए सख्त कानून बनाये गये हैं उसी तरह मानव जीवन और उनके पालतू मवेशियों की सुरक्षा के एवज में सुविधायें भी उपलब्ध करायें। आज कान्ति देवी ने एक बकरी नहीं बल्कि अपनी एक साथी खोयी है, क्योकि घर गॉव में लोग मवेशियों को अपनी औलाद की तरह पालते हैं, उनसे पशु समझकर नहीं बल्कि अपना समझकर बहुत लगाव रखते हैं, तब इस परिस्थिति में उनसे उनका रोजगार का साधन छीन जाय तो उनको रोना नहीं आयेगा तो क्या आयेगा। यहॉ पर उस असहाय महिला के लिए वह बकरी सिर्फ बकरी नहीं थी बल्कि वह उसकी जमा पूॅजी थी।

हमारे पहाड़ो में लोग किस तरह से अपना व्यवसाय करे, यह उनके लिए वास्तव में सोचनीय विषय जरूर है, क्यांंकि हमारे लिए जोखिम उठाने के लिए इतना धन नहीं होता है कि वह सब्र कर सके। ऐसी दशा में पहाड़ में लोग पलायन को मजबूर हो जाते हैं, और तब वह अपने आप को असहाय पाकर एक दिन शहर की ओर मजबूरी में रूख कर लेते हैं।

वन विभाग, पार्क प्रशासन जिस तरह के नियमों में मानव को उलझा कर रख देता है, उससे कोई भी पशुपालक उसके मुआवजे के लिए प्रयास नहीं करता है, क्योंकि उसके लिए वह झंझट भरा कार्य लगता है, दूसरा उसके पास अन्य मवेशियों की रक्षा करना उनका पालन पोषण करना भी होता है। पहाड़ी क्षेत्रों मे जहॉ आज खेती नहीं होने से घर गॉव की जमीन बंझर पड़ गयी है, उसमें झाड़ी उग चुकी है। घर के पास भी सारी झाड़ी है, जिसमें जंगली जानवरों को घर के समीप ही उन झाड़ियों मे निवास करने लगते हैं, और मवेशियों को अपना शिकार बना रहे हैं, वहीं खेती को सुअर, मोर, खरगोश आदि जंगली जानवर खेती को भी नुकसान पहॅुचा रहे हैं, जब तक खेती के लिए चकबंदी के लिए स्थायी नीति नहीं बन पायेगी तब तक पहाड़ में खेती करना और उसके साथ पशुपालन व्यवसाय करना खतरों से भरा रहेगा।

शासन प्रशासन, और सरकार के साथ जनप्रतिनिधियों का दायित्व बनता है, कि यदि पहाड़ में खेती और पशुपालन व्यवसाय के जोखिम को कम करने का प्रयास करें। मैं उत्तराखण्ड के वन मंत्री श्री हरक सिंह रावत जो पहाड़ के मूल के हैं, उनकी पीड़ा को समझे और वन विभाग से पशुपालकों को उनके मवेशियों की वास्तविक कीमत अदा करने को सीधे निर्देशित करें, ताकि पहाड़ का गरीब पशुपालक अपने मवेशियों को पालना अभिशाप ना समझे।

वहीं यमकेश्वर क्षेत्र में जो अज्ञात जानवर मवेशियों को नुकसान पहॅुचा रहा है, साथ ही मानव जाति के लिए भी खतरा बना हुआ है उसको पकड़ने के लिए वन विभाग द्वारा प्रयास किया जाना नितान्त आवश्यक है, साथ ही जंगलों में सीसीटीवी कैमरे लगवाकर उस जानवर का पता लगाने की पहल करे।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि क्या पहाड़ के लोगों के लिए हमेशा इस तरह ही दुर्गम जीवन यापन करना पड़ेगा, क्या उसके लिए विकास होना दूसरे ग्रह की बात है, या फिर वह हमेशा के लिए राजनीतिक दलों के लिए शासन करने हेतु उनका मतदाता बनकर उनके आश्वासनों के बोझ के नीचे दबकर रह जायेगा। या फिर उन पहाड़ पर रहने वाले लोगों को भी मजबूर होकर अपने आवासों को छोड़कर कंकरीट के जंगलों मे आकर जीवन यापन करने के लिए शहर शहर ठोकरों को सहना पड़ेगा।

हरीश कंडवाल मनखी की कलम से।

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