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गैरसैंण उत्तराखंडकी जनता के लिये एक अनसुलझी कहानी का हिस्सा। जिसको केंद्र में रखकर अलग राज्य बनाने को जनांदोलन किये गये। लेकिन आज भी गैरसैंण को लेकर राज्य सरकार ने कोई बड़ा फैसला नहीं लिया है। औपचारिकतायें कई की गई, परशायद राजनेतिक दलों की कसौटी पर खरा उतर पाना गैरसैंण के लिये कड़ी चुनौती साबित हो रहा है। हालांकि साल 2012 मेंबनी कांग्रेस सरकार की जरूर सकारात्मक पहल गैरसैंण को लेकर नजर आ रहीहै। पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में कैबिनेट बैठक कर विधानसभा भवन की नींव रखी तो अब मौजुदा सीएम हरीश रावत ने गैरसैंण में तीन दिवसीय विधानसभा सत्र का आयोजन कर गैरसैंण की उम्मीदो को सियासी उड़ान देने का काम किया है। जनता की उम्मीदों का केंद्र बिंदू गैरसैंण राज्य गठन के चैदह सालों बाद राजनीति के गलियारों की हलचल बढ़ाने का काम कर रहा है। 90 केदशक में जब तत्कालीन उत्तरप्रदेश में अलग राज्य उत्तरांचल की मांग उठने लगी। तो सभी आंदोलनकारियों का एक ही लक्ष्य था की अलग राज्य अगर बनता है तो उसकी राजधानी गैरसैंण ही बने। गढ़वाल और कुमांउ मंडल के केन्द्र में बसा गैरसैंण चमोली जनपद का हिस्सा है। जंहा से देहरादून भी उतना ही दूर है तो उधमसिंहनगर भी। शायद सूबे की जनता ने पहाड़ और मैदान की इन्हीं सब परेशानियों को देखते, समझतेहुये गैरसैंण को अपने आंदोलनों का केंद्र बनाया। लेकिन अलग राज्य तो मिला नहीं मिली तो गैरसैंण को मन माफिक इज्जत, जिसकेलिये गैरसैंण आज भी तरस रहा है। एक दशक बीत जाने के बाद सरकार का मन कुछ हद तक गैरसैंण के प्रति नरम होता नजर आ रहाहै। कभी राजनीति का मुख्य मुद्दा रहा गैरसैंण अब गैर नहीं है। भले ही भाजपा गैरसैंण को लेकर कोई बड़ा फैसला लेने की मांग राज्य की कांग्रेस सरकार से कर रही हो। वंही कांग्रेस सरकार ने बड़ा ना सही लेकिन छोटी-छोटीखुशिंया गैरसैंण की जनता की झोली में डालनी शुरू कर दी है। पहले पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पूरी कैबिनेट को गैरसैंण की सैर कराई तो उसके बाद एक कदम और आगे बढ़ते हुये गैरसैंण के भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन का शिलान्यास किया। जिसका निर्माण कार्य भी शुरू हो चूका है। इतना सब होने के बाद भी गैरसैंण को सम्मान की दरकार थी। जो कुछ हद तक खत्म हुई साल 2014 केजून माह में जब उत्तराखंड राज्य के नये निज़ाम हरीश रावत ने तीन दिनों का विधानसभा सत्र गैरसैंण में ही आहुत करा डाला और सत्र की समाप्ति पर एलान किया हर साल एक विधानसभा सत्र के गैरसैंण में होने का। सत्र के सफल आयोजन ने काफी हद तक गैरसैंण की सियासी उड़ान को पंख देने का काम किया है। दूसरी तरफ विपक्ष में बैठी भाजपा का रोल कुछ हद तक सवालो के घेरे में रहा। भाजपा पहले ही गैरसैंण को राजधानी के किसी भी रूप में स्वीकारने की बात करती रही है। लेकिन वंही गैरसैंण में बैठकर अपनी इस मांग को भाजपा और भी पूरजोर तरीके से उठा सकती थी। जो की पूरे सत्र के दौरान भाजपा विधायको की जबान से नदारद रही। तो उधर कांग्रेस सरकार ने भी सत्र की कार्यसूची में गैरसैंण को शामिल करना जरूरी नहीं समझा। जिसको देखने के बाद दोनो ही दलो की बातो पर संदेह होना भी लाजमी है कि कहीं दोनो ही दल अंदरखाने मिलकर जनता को बेवकूफ बनाने का काम तो नंही कर रहे। लेकिन फिर भी गैरसैंण की जनता की उम्मीदे परवान चढ़ने लगी है। बहुत ना सही लेकिन थोड़ा में ही संतुष्ट होते हुये अब क्षेत्रीय जनता सरकार के उन फैसलो के पूरा होने के इंतजार में है। जो की गैरसैंण में बैठकर हुक्मरानो ने लिये है। अस्थाई विधानसभा भवन में तीन दिन तक प्रदेश के विकास से जुड़े मुद्दो पर चर्चा हुई। भले ही अंदर का माहौल देहरादून के भवन से ज्यादा अलग नहीं था। लेकिन बाहर का माहौल जरूर बदला बदला सा था। गैरसैंण के आस पड़ोस के ग्रामीणों में उत्सुकता थी उन चेहरों को देखने की जो उन्होंने कभी कभार समाचार पत्रो और चैनलों में ही देखे थे। वो चेहरे अब उनके सामने थे। जिनके साथ वो अपनी पीड़ा को बंया भी कर सकते थे और साझा भी। तीन दिनों तक तंबू में सरकार चली है गैरसैंण से। जिसने सरकार की एक नई सोच को जन्म दिया तो जनता को भी अपनेपन का एहसास हुआ की चुनावी वादो से इतर भी सरकार जनता के द्वार पंहुच सकती है। सरकारी वाहनों की ची पौं से गुलजार गैरसैंण की आबोहवा अब हमेशा ऐसे ही गुलजार रहे। इसका इंतजाम भी मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कर दिया है। सत्र के समाप्त होने के तुरंत बाद की गई घोशणाओं में गैरसैंण के विकास को लेकर ताना बाना बुना गया। जिसमें सड़को की कनेक्टीविटी पर जोर रहा, तोसाथ में क्षेत्र का विकास भी इसमें महत्वपूर्ण रहा। जिसको ध्यान में रखकर ही सभी घोशणायें की गई है। गैरसैंण के सरकारी अस्पताल को अपग्रेड करना, पीडब्लूडीगेस्ट हाउस को सर्किट हाउस की तर्ज पर विकसीत करना, विभिन्नपेयजल योजनाओ को स्वीकृति देना तो साथ में बिजली व्यवस्था को भी सुचारू करना प्राथमिकता में शामिल है। जिनको देखकर आप खुद अंदाजा लगा सकते है की गैरसैंण को लेकर राज्य सरकार सोचने लगी है और जल्द ही आने वाले दिनांे में गैरसैंण को लेकर बड़ा फैसला लिया जा सकता है।

गैरसैंण की पूरी पिक्चर में भारतीय जनता पार्टी की भी काफी अहम भूमिका हो जाती है। अलग राज्य की पहली अंतरिम सरकार भाजपा की थी। जिसमें काफी हद तक राजधानी पर तस्वीर साफ हो जानी चाहिये थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अस्थाई राजधानी के तौर पर बनी दून आज भी अस्थाई राजधानी ही बनी हुई है। साल दर साल सूबे केविकास कार्य यहीं पर बैठकर पूरे किये जा रहे है। गैरसैंण को लेकर भाजपा अपना स्टैंड हमेशा साफ रखने की बात करती है। लेकिन आज तक भी भाजपा की सफाई सामने नजर आई। हर बार के चुनावी मौसम में भाजपा ने भी इस मुद्दे को भरसक तरीके से भुनाने की कोशिश की और कुछ हद तक कामयाब भी रही है। वहीं अब पहाड़ की जनता को मुद्दा नहीं जमीन पर हकिकत चाहिये। जिसके लिये वो कुछ भी करने को तैयार है। लेकिन भाजपा का अलग थलग वाला रवैया क्षेत्रीय जनता को भ्रमित करने का काम कर रहा है। जिससे बचते हुये भाजपा को भी जनता के बारे में सोचने और करने की जरूरत है। साथ में गैरसैंण सत्र का पहला आयोजन भी भाजपा को अच्छा फायदा दिला सकता था। लेकिन वो मौका भी भाजपा ने हाथ से गंवा डाला और अब सारा श्रैय कांग्रेस लेने का काम कर रही है। ऐसे में अगर भाजपा दोबारा से जनता के बीच जाकर गैरसैंण का राग अलापती है तो फिर जनता को अपने जवाब से संतुष्ट करना भी कड़ी चुनौती होगा।

तंबू में बैठकर चली गैरसैंण से उत्तराखंड सरकार। जो जनता के बीच एक सार्थक पहल के तौर पर देखी जा रही है। हिमाचल प्रदेश के बाद अब शायद उत्तराखंड दूसरा राज्य बन गया है। जहंा तंबू का सहारा लेकर सरकार को चलाने की कोशिश की गई है। लाखो की लागत से गैरसैंण में बनी विधायको की तंबू कालोनी अलग ही रंग में नजर आ रहीथी। जंहा पर सरकार भी तंबू में बैठकर विधानसभा सत्र का ताना बाना बून रही थी। तो विपक्ष भी तंबू कालोनी में ही बैठकर सरकार के जवाबो पर सवाल तलाश रहा था। कुल मिलाकर पुराने समय की याद ताजा करने वाली उत्तराखंडी विधायको की तंबू कालोनी जनता के दिलों में जगह बनाने में कामयाब रही है और जनता को भी लगने लगा है कि उनके चुने हुये जनप्रतिनिधी आम ग्रामीणांे की ही तरह खेतो में भी तंबू लगाकर रह सकते हंै। दूसरी तरफ गैरसैंण में विधानसभा भवन भी टंेट का ही बनाया गया। जिसके भीतर का माहौल पूरी तरह से अस्थाई राजधानी देहरादून स्थित विधानसभा भवन का माहौल पैदा कर रहा था। कुल मिलाकर गैरसैंण के अलावा आसपास की जनता को भी विश्वास होने लगा है की देर से ही सही लेकिन सरकार को आंदोलन की जननी रही गैरसैंण की सुध आने लगी है।

लोकसंस्कृति और परम्पराओं को संजोने की भी रही कोशिश। गैरसैंण का विधानसभा सत्र कई चीजांे का गवाह बना है। गैरसैंण पंहुचने वाले मेहमानों का क्षेत्रीय विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष अनुसूईया प्रसाद मैखुरी ने ढ़ोल दमो की थाप के बीच तिलक लगाकर और खास तौर पर सत्र के मेहमानों के लिये बनाई गई स्थानीय टोपी पहनाकर स्वागत किया। जिसमें सीधा सा तर्क दिया गया है पहाड़ की संस्कृति को जनता से जोड़कर रखने की। आज के समय में पलायन के साथ ही पहाड़ की संस्कृति भी पलायन कर चूकी है। लेकिन उसके बचाव में बेहद ही कम लोग नजर आ रहेहैं। अब गैरसैंण सत्र के बहाने ही सही लेकिन सरकार को अपनी संस्कृति की याद तो सताने लगी ही है। तीन दिन के सत्र में जितनी चर्चा विधानसभा भवन के भीतर की रही उतनी ही चर्चा विधानसभा भवन के बाहर लोक परम्पराओ की भी रही। सत्रावसान के बाद लोक कलाकारो की प्रस्तुतियों ने सबका मन मोहने का काम किया। जिसके रंग में रंगकर खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत और अन्य विधायक भी अपने आप को नृत्य करने से रोक ना पाये। कुल मिलाकर सत्र का रंग नेताओ पर भी चढ़ा हुआ नजर आया। जिसकी बदौलत अब गैरसैंण की सियासी उड़ान को भी पंख लगते नजर आ रहेहैं।

गैरसैंण में ही बनी मुखिया की चुनावी जमीन तलाशने की भूमिका। लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार धारचूला विधायक हरीश धामी ने गैरसैंण में ही अपनी सीट से इस्तीफा देने का ऐलान किया और सीएम को न्यौता दिया वंही से विधानसभा का सफर तय करने का। जिसको मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मान भी लिया। हरीश रावत के लिये सबकुछ त्याग देने की बात करने वाले धारचूला के पूर्व विधायक ने गैरसैंण को ही अपनी त्यागस्थली चूना और हरीश रावत के प्रति अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हुये विधायकी से इस्तीफा दे डाला। अब उपचुनाव में धारचूला क्षेत्र की जनता को फैसला करना है कि वो धामी के इस्तीफे से कितना इत्तेफाक रखती है।

देखा जाये तो गैरसैंण में इतना हल्ला तब नहीं मचा जब पहली बार पूरी सरकार ने गैरसैंण की धरती पर कदम रखा। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल और मुख्यमंत्री हरीश रावत की पहल के बाद गैरसैंण अब कई निशानियों का गवाह बन गया है। जिसमें विधायको के तंबू भी हैं तो विधानसभा भवन का बंबू भी। लोक परम्परा को बचाने की कोशिश है तो हरीश धामी की भक्ति भी। विपक्ष का हंगामा भी नजर आया तो पक्ष की मजबूरी भी। अब गैरसैंण की जनता को इंतजार रहेगा इस बात का की कितनी जल्दी सरकारी घोषणायें धरातल पर नजर आती हैं। जिनके बलबुते गैरसैंण अपनी सियासी उड़ान उड़ने में कामयाब हो पाता है।

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