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देवभूमि में एक साल पहले आई आपदा में हजारों लोग जमींदोज हो गए थे। तत्कालीन सरकार ने अपनी नाकामी को छिपाने के लिए शुरूआत में ऐलान किया कि मरने वालो की संख्या महज 600 से 700 के आस पास थी। बाद में सरकार ने आपदा में मरने वालों लोगों के जो आंकडे बताए वो 4500 केलगभग थे। अगर ऐसा ही था तो उस दिन केदारनाथ में जो हजारों लोग थे वो कहां गायब हो गए। सरकार की नीयत पर सवाल उठना भी लाजमी है कि जल प्रलय के एक वर्ष बाद भी केदार घाटी में नर कंकालों के मिलने का सिलसिला लगातार जारी है। जो सरकार की नाकामियों और संवेदनहीनता की चुगली कर रहे हैं। उत्तराखंड में पिछले साल जून माह में आई आपदा के बाद दुर्भाग्य से न तोसमय से राहत अभियान शुरू हो पाया और न उसकेबाद जिम्मेदारी तय की जाती है। 16 जूनको आई आसमानी आफत के चार दिन बाद ही पता चला गया था कि जलप्रलय से बचने के लिए हजारों श्रद्धालु पहाड़ की चोटियों और घने जंगलों की ओर चले गए। विभिन्न सूत्रों से मिली इन सूचनाओं पर सरकार ने गम्मभीरता के साथ ध्यान देने की जहमत नहीं उठाई। सरकार बस उन लोगों को बचाने के प्रयास में लगी रही जो किसी शहर या कस्बे के पास मदद के इंतजार में खड़े थे। इसका नतीजा यह हुआ कि पहाड़ की चोटियों पर जान बचाकर भागे लोग या तो भूख से या ठंड से या फिर जहरीली वनस्पतियां खाकर मौत का निवाला बनते चले गए। और सरकार संवेदनहीन बनी रही। सरकार की संवेदनहीनता यहीं खत्म नहीं हुई। तिल-तिलकर मौत का निवाला बने इन आभागे चारधाम यात्रियों और स्थानीय लोगों के शवों की अंत्येष्टि या उन्हें उनके परिजनों तक पहुंचाने का भी कोई ठोस प्रयास नहीं किया। सरकार ने उन लोगों को भी पहाड़ की ओर जाने नहीं दिया जिनके परिजन आपदा के दौरान गायब हो गए थे। सरकार ने यदि जरा सी भी संवेदना दिखाई होती तो आज एक वर्ष बाद घाटी में जो नरकंकाल मिल रहे हैं वे नहीं मिलते। उन शवों का बहुत पहले अंतिम संस्कार हो जाता और शायद यह भी संभव है उनकी शिनाख्त भी हो जाती। घाटी में बिखरे शवों को जंगली जानवर नोंचते रहे और सरकार के अधिकारी कर्मचारी आपरेशन केदारघाटी की कामयाबी पर इठलाते रहे। यही नहीं राज्य सरकार ने तो इस मिशन को इतना कामयाब मान लिया कि आपदा से जुडे अधिकारियों-कर्मचारियों को सम्मानित करने के लिए बकायदा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बडा सवाल ये है कि जब मिशन केदारघाटी की कामयाबी के लिए अफसरों और कर्मचारियों को सम्मानित किया गया तो क्या अब जब नरकंकाल मिल रहें हैं। क्या ईनाम लेने वालों को उनकी नाकामी सामने आने पर सजा दी जाएगी। उन सब गुनहगारों को बेनकाब कर सलाखों के पीछे भेजा जाएगा। जिनकी वहज से सैकड़ों शव जगलों में सड़ते रहे। लेकिन शायद इसका जबाब किसी के पास नहीं है। विपक्ष जरूर पूर्व सीएम विजय बहुगुणा पर हत्या का मुकदमा दर्ज किए जाने और मौजूदा सीएम हरीश रावत के इस्तीफे की मांग कर रहा है। पर उनकी मांग भी राजनीति में रंगी नजर आ रहीहै। उस समय तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा ने कहा था कि केदारघाटी या आसपास के इलाके में अब कोई शव नहीं है। इसी दावे के साथ सरकार ने केदारनाथ में पांच सितम्बर से पूजा भी शुरू करा दी थी। लेकिन हकीकत सबके सामने है। एक साल पहले सरकार की ओर से जो दावे किए किए गए वो सब धराशायी हो गए हैं। केदारघाटी में नरकंकाल मिल रहे हैं। जिसके बाद सवाल यह उठता है कि कौन है केदारघाटी में मिल रहे नर कंकालों के लिए गुनहगार। तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा और मौजूदा सीएम हरीश रावत कांग्रेस सरकार की इस नाकामी पर पर्दा डालने के प्रयास में लगे हुए हैं। अलबत्ता डीआईजी संजय गुज्याल के नेतृत्व में एक टीम जरूर बना दी गई है। जो केदारघाटी में फिर से शवों कंकालों की तलाशी के लिए अभियान चलाएगी। लेकिन प्रदेश की आवाम को ये भी महज खाना पूर्ति नजर आ रहीहै।

 

कांबिंग आपरेशन पर उठे सवाल।

केदारघाटी में हुए दुनिया के सबसे बड़े रेस्क्यू आपरेशन में लाखों जानें सेना ने बचा लीं। लेकिन इसके बाद शवों और लापता लागों को तलाशने का जिम्मा राज्य सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। नवंबर 2013 तकतीन बड़े कांबिंग आपरेशन चलाकर हर शव को ढूंढने का दावा करने वाली सरकार निश्चिंत होकर बैठ गई। अब एक बरस के बाद जंगलचट्टी में कंकाल मिलने से कांबिंग आॅपरेशनों की हकीकत बयां हो गई है। अपने परिजनों की तलाश में देश भर से लोगों का जमावड़ा राजधानी देहरादून से ऋषिकेश हरिद्वार रुद्रप्रयाग गौरीकुंड तक लगा रहा। लोग परिजनों की तलाश में केदारनाथ तक जाने की अनुमति मांगते रहे। लेकिन सरकार ने सुरक्षा के लिहाज से केदारनाथ घाटी में प्रवेश बंद कर दिया।

 

पूर्व सैनिकों का इस्तेमाल नहीं हुआ

देवभूमि में करीब डेढ़ लाख पूर्व सैनिक रहते हैं। बावजूद सरकार ने आपदा राहत कार्यो में उनका इस्तेमाल नहीं किया। पूर्व सैनिक यदि अपने-अपनेजिलों में कमान संभाल लेते तो न सिर्फतत्काल बचाव कार्य शुरू होता बल्कि राहत पहुंचाने में भी वे मददगार साबित होते। पूर्व सैनिक जो ऐसे हालातों से निपटने के लिए ट्रेंड होते हैं उनकी मदद से रस्सी बांधने, अस्थाईपुल बना लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया जा सकता था।

 

सम्मान से हो सकता था अंतिम संस्कार

आपदा में मरे लोगों के साथ अब जिन लोगों के कंकाल मिल रहे हैं उनकी मौत पहाड़ के ऊपर जंगलों में हुई। जो शायद भूख-प्यासऔर ठंड से मरे होंगे। यह सच है कि सेना और सरकार की मदद से एक लाख से अधिक फंसे लोगों को निकाला गया। सरकार कम से कम दो बटालियन गढ़वाल और कुमाऊं जिनकी पहचान सीधे तौर पर उत्तराखंड से जुड़ी है। उनका लंबे समय तक इस्तेमाल करती। स्थानीय लोगों को रोकने की बजाय सेना के साथ भेजकर तभी कांबिंग कराई जाती और मृतक आत्माओं को सम्मान मिलता।

 

आपदा के दौरान एडुसेट बनता सहारा

आपदा के दौरान कम्युनिकेशन सिस्टम पूरी तरह ठप हो गया था। बिजली आपूर्ति, टेलीफोनलाइनों के साथ मोबाइल नेटवर्क ठप हो गया था। उस दौरान अगर सरकार ने डिस्टेंस एजुकेशन सेटेलाइट (एडुसेट) के तंत्र को अपनाया होता तो शायद सरकार कहीं तक पीडितों के साथ खड़ी दिखाई देती। इसरो के माध्यम से सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से पूरे देश में एडुसेट विकसित किया गया है। देहरादून में भी एडुसेट का सेंटर काम करता है। और प्रदेश के सभी जिलों के डिग्री कालेज इस सिस्टम से जुड़े हैं। सेटेलाइट से जुड़े होने के कारण देहरादून से बैठकर ही सभी जिलों से सीधे जुड़कर तमाम जरूरी संदेशों को आदान-प्रदानकिया जा सकता था। इस माध्यम से देहरादून पहुंच रहे परिजनों को उनके अपनों के संदेश पहुंचाये जा सकते थे।

 

श्रेय लेने में बीत गए 365 दिन

केदारघाटी में हुए जलप्रलय को एक वर्ष बीत चुका है। जहां एक ओर प्रभावित आज भी आधारभूत सुविधाओं के लिए सरकार का मुंह ताक रहे हैं। वहीं दूसरी ओर राज्य की सरकार ने पूरा साल केवल श्रेय लेने में ही बीता दिया। पहले सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आपदा के दौरान राहत कार्यो को लेकर अपनी पीठ थपथपाते रहे और अब हरीश रावत भी इसी परंपरा को निभा रहे हैं। इसके विपरीत केदारघाटी सहित कई प्रभावित इलाकों में आज भी लोग बिना सुविधाओं और संसाधन के जिंदगी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। आज भी कई ऐसी योजनांए है जिनको धरातल पर उतरने का इतंजार है।

 

योजनाओं को धरातल पर उतारने का इंतजार।

केदारनाथ धाम को मॉडल टाउनशिप के रूप में विकसित करना।

चारों धामों के लिए वैकल्पिक मार्ग बनाना।

जल निकासी की व्यवस्था वाली सड़कें बनाना।

भूकंपरोधी मकानों का निर्माण।

गांवों के लिए बिजली, पानीकी व्यवस्था करना।

अस्पतालों और स्कूलों का निर्माण।

नदियों की फ्लड जोन की मैपिंग करना।

आपदा की मार झेल सकने वाले पुलों का निर्माण करना।

वैकल्पिक मार्गो का निर्माण।

आपदा प्रबंधन की विश्वस्तरीय व्यवस्था करना।

 

सरकार की प्लानिंग पर उठे सवाल।

केदारघाटी में हुई आपदा से पहले न जानेकितनी आपदाएं निकल चुकी हैं। मगर चेतावनी सिस्टम के विकसित होने का इंतजार सूबे के लोगों को आज भी है। एसडीआरएफ का मुख्यालय अभी तक तय नहीं हो पाया है। जबकि इसकी स्थापना मानसून शुरू होने से पहले कर लेने का दावा किया गया था। सरकार से ये उम्मीद की जा रही थी कि अबकी बार तो उसका स्टेट डिजास्टर प्लान बनकर तैयार हो ही जाएगा। लेकिन वो कहां है। इसका ठोस जबाब किसी के पास नहीं है। आपदा ने कई लाइलाज जख्म दिए हैं। लेकिन कभी सरकारों ने इनका इलाज करने की जहमत नही उठाई। सरकार का ध्यान सिर्फ दर्द का इलाज करने तक ही सीमित रहा। यही वजह है कि सरकार के आपदा राहत कार्यांे पर सवाल उठ रहें हंै।

 

नहीं बना पाए डीएनए डाटा बेस

प्रदेश सरकार ने शवों से एकत्र किए डीएनए सैंपल का डाटा बैंक तैयार करने के लिए उन्हें सीएफएसएल लैब में भेजा है। इस डाटा का इस्तेमाल लापता लोगों से संबंधित अगर कोई जांच करवाना चाहे तो उसके लिए किया जाएगा। शवों की शिनाख्त के लिए उनके वस्त्र, अभिलेख, जेवरात आदि को अलग से सील किया जाएगा। घोषित मृतकों की संख्या 4025 है।लेकिन महज छह सौ का सैंपल ही शव मिलने पर एकत्र हो पाया है। डीएनए डाटा बेस के नाम पर भी महज खानापूर्ति देखी जा रही है।

 

कितनी झीलें बन रहीं ध्यान नहीं

हिमालयी क्षेत्र में करीब 2500 ग्लेशियरहैं। ऐसे में केदारघाटी में तबाही मचाने वाली चैराबाड़ी झील की तरह ही कितनी और झीलें वहां पनप रही हैं। इस पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है। मौसम बदल रहा है। राज्य ने 2012 मेंजलवायु परिवर्तन का ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया था। नौ हजार करोड़ रुपये की इस कार्ययोजना पर बैठक तो हुई। लेकिन आपदा की बढ़ती घटनाओं के बावजूद, नतो इस कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। और न हीआपदा प्रबंधन को ठोस रूप दिया गया।

 

कुर्सी-कुर्सीके खेल में मशगूल रहे राजनीतिक

देवभूमि में आई आसमानी आफत को एक साल हो गया है। लेकिन एक साल में धरातल पर जो काम होने चाहिए था वो नजर नहीं आ रहेंहंै। एक साल का समय किसी भी लिहाज से कतई कम नहीं होता। कम से कम एक साल में चारधामों के यात्रा मार्ग को तो चाक चैबंद किया ही जा सकता था। मगर ऐसा नहीं हुआ। तमाम व्यवस्थाओं को पटरी पर लाने के बजाय प्रदेश के राजनीतिक कुर्सी-कुर्सीके खेल में मशगूल रहे। प्रदेश की जनता भलीभांति जानती है कि आपदा के साल में ही राज्य में सबसे अधिक राजनीतिक नौटंकियां हुई। 

 

बीआरओ और अधिकारियों में ठनी

आपदा राहत कार्यों को लेकर सरकार स्वयं की मशीनरी से भी दो चार हाथ करती नजर आई। सालभर कभी बीआरओ से काम कराने की बात तो कभी बीआरओ से सड़कें वापस लेने की बात होती रही। ऋषिकेश से उत्तरकाशी, केदारनाथसे रुद्रप्रयाग, ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग, थराली से लामबगड़ और टनकपुर से पिथौरागढ़ सड़क मार्ग निर्माण और रखरखाव अगले वित्त वर्ष से राज्य सरकार खुद करेगी। फिलहाल बीआरओ के पास 647.8 किलोमीटरराष्ट्रीय राजमार्ग, 346.2 किलोमीटर जनरल स्टाफ रोड, 37.4 किलोमीटरगृह मंत्रालय की सड़कें और 18 किलोमीटरके अन्य डिपोजिट वर्क हैं। एक साल तक आपदा ग्रस्त क्षेत्र के लोग सरकारी मशीनरी की मदद को ताकते रहे। लेकिन मिला कुछ नहीं।

 

विस्थापन के नाम पर करोड़ों की मांग

हर साल कुदरती आपदा राज्य में खतरे के जद वाले गांवों में इजाफा कर देती है। प्रदेश सरकार इस दिशा में ठोस काम करने के बजाय केंद्र सरकार से सिर्फ सियासी रोटियां सेंकने के मकसद से पैसे की गुहार लगाती रहती है। मदद के पैसे हासिल करने के लिए क्या करना है, किनमानकों को पूरा किया जाना है, इसेसब भूल जाते हैं। ऐसे में मदद मिलने से तो रही। आलम यह है कि केंद्र से हर साल करोड़ों मांगकर औपचारिकता पूरी करने वाली राज्य सरकार ने अभी तक विस्थापन को लेकर न तोजरूरी सर्वे करवाए और डीपीआर तैयार की गई। चमोली-61, बागेश्वर-42, पौड़ी-26, अल्मोड़ा-09, नैनीताल-06, पिथौरागढ़-126, टिहरी-27, उत्तरकाशी-08, रुद्रप्रयाग-16, देहरादून-02, उधमसिहंनगर-01, चम्पावत-10

 

383 दिन, 635 शवऔर वारिस 1 भीनहीं

पूरी दुनिया को हिला देने वाली उत्तराखंड की त्रासदी को हुए 384 दिनहो गए हैं। अभी तक 635 शवमिल चुके हैं और वारिश एक भी नहीं। एक ओर जहां दावेदार भी आगे नहीं आ रहेंहै। तो पुलिस ने भी ज्यादा जागरुकता दिखाने की जरूरत नहीं समझ रही है। महज दस प्रतिशत परिजनों के सैंपल लिए गए। कांबिंग अभियान के दौरान केदारनाथ घाटी की त्रासदी के बाद से अब तक कुल 635 तकशव बरामद हो चुके है। इनमें इसी साल मिले 51 नएकंकाल भी शामिल हैं।

 

भगवान भरोसे आपदा प्रबन्धन।

भगवान भरोसे आपदा प्रबन्धन। मौसम के सटीक पूर्वानुमान के जरिए अर्ली वार्निग सिस्टम विकसित करने की मुहिम भी अब तक महज कागजों में ही दौड़ रही है। तबाही के एक साल बाद मानसून फिर सिर पर है। दैवीय आपदा की घटनाओं से निपटने के सरकारी इंतजाम अब भी लोगों के भरोसे पर खरे नजर नहीं आ रहे।दैवीय आपदा से हुई भीषण तबाही के करीब एक साल बाद ही सही, मगरकेंद्र सरकार ने उत्तराखंड में इसके लिए 116 करोड़रुपये की परियोजना मंजूर की है। इसके तहत चार डाप्लर रडार, 75 रेनगेजमीटर, पांचमाइक्रो रेन रडार, चारकांपेक्ट रडार, 75 ऑटोमेटिकवेदर स्टेशन और हेलीकाॅप्टर सपोर्ट वेदन सिस्टम विकसित किए जाने हैं। मगर डाप्लर रडार के लिए अब तक जमीन भी नहीं तलाशी जा सकी है। वहीं, पहाड़में 52 हैलीपैडबनाने के लिए एडीबी के तहत मंजूर 100 करोड़की योजना पर भी अभी शुरुआती कसरत ही चल रही है।

 

233 संवेदनशील गांवों पर भूस्खलन का खतरा।

आपदा के दिए जख्म अभी भरे भी नही कि अब एक और आफत सामने खड़ी है। जिससे उत्तराखंड के सैकड़ो गांवों के लोगों में दहशत का माहौल है। उत्तराखंड के उधमसिंहनगर, हरिद्वार को छोड़ शेष 11 जनपदआपदा प्रभावित हैं। खासतौर पर पहाड़ी जनपदों के बागेश्वर, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी व चमोलीजनपदों के कई क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से अत्याधिक संवेदनशील हैं। वर्षा ऋतु शुरू होते ही इन क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं शुरू हो जाती हैं। सरकार ने 233 गांवभूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील चिह्न्ति कर इनका सर्वेक्षण शुरू किया है। वहीं भू-वैज्ञानिकोंके अनुसार उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों में भूगर्भीय हलचल जारी है। कई स्थानों पर संवेदनशील थ्रस्ट गुजर रहे हैं। भूगर्भीय हलचलों के कारण कई क्षेत्र भूकंप व भूस्खलनसे प्रभावित हैं। वहीं गावों के विस्थापन पर आपदा पुनर्निर्माण एवं अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र भंडारी की मांने अभी गांवों के विस्थापन के लिए सरकार के पास धन की व्यवस्था नहीं है। धन की व्यवस्था होते ही कार्रवाही शुरू कर दी जाएगी।

 

तो देवभूमि में नहीं आती जल प्रलय

इतिहास हमेशा से इस बात का गवाह रहा है कि जब-जबइंसान ने ईश्वरीय सत्ता को चुनौती दी है तो उसे दैवीय आपदा के रूप में तबाही का सामना करना पड़ा है। कुछ इसी तरह के मानवीय साहस का परिणाम देवभूमि के नाम से मशहूर उत्तराखंड के केदारनाथ धाम समेत कई इलाकों में 16 जूनकी शाम को आए जल प्रलय के रूप में पूरी दुनिया ने देखा। किसी ने सच ही कहा है कि ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देना खुद के अस्तित्व को मिटाने जैसा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि श्रीनगर में गंगा की धारा के बीच स्थापित धारी देवी की मूर्ति हटाए जाने से जल प्रलय आया। प्रकृति की हर गतिविधियों को विज्ञान के नजरिये से देखने वाले लोग भले ही इसे अंधविश्वास मान रहे हों, लेकिनभक्तों और संतों का तर्क मानें तो 16 जूनको धारी देवी की मूर्ति को हटाया गया था और इसी वजह से जल प्रलय ने देवभूमि में तबाही मचाई। यह निश्चित रूप से धारी देवी का ही प्रकोप है। आस्थावान लोगों का यह भी मानना है कि अगर धारी देवी की मूर्ति को उनकी जगह से नहीं हटाया जाता तो जल प्रलय नहीं आता। इससे पूर्व 1882 मेंभी एक राजा ने मंदिर की छत को जब अपने तरीके से बनाने की कोशिश की थी तो उस समय भी इसी प्रकार की विनाशलीला देखी गई थी।

केदारनाथ मार्ग पर रौनक नहीं

बाबा केदारनाथ के दर्शनों को बहुत कम लोग पहुंच रहे हैं। बीते साल मई जून तक तीन लाख 10 हजार 615 लोग आए हैं। इसी अवधि में इस साल सिर्फ 23 हजारलोग पहुंचे हैं। हर रोज 10 से 15 हजार लोग केदारनाथ आते थे, अबमुश्किल से तीन सवा तीन सौ आ रहेहैं। व्यापारियों, कारोबारियों के साथ इन दिनों तीर्थयात्रियों से गुलजार रहने वाले केदारनाथ मार्ग पर रौनक नहीं है।

एक साल बाद हालत भले ही लोगों की उम्मीद के मुताबिक न सुधरे हों। लेकिन अब भी अगर समय रहते राज्य सरकार इन तमाम बातों के साथ आपदा राहत, पुर्नवास और विस्थापन को लेकर लिए गए निर्णयों को धरातल पर उतारना शुरू करा दे और पूरी संवेदनशीलता के साथ आपदा पिडितों की मदद के साथ आपदा प्रबन्धन को मजबूती प्रधान करे तो भविश्य में हमें किसी के आगे हाथ फैलाने और मदद मांगने की जरूरत नहीं पडेगी और सरकार के साथ जनता भी आसमानी आफत का मजबूती से मुकाबला कर सकतीं है।
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