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ओएनजीसी लिमिटेड देश का एक सार्वजनिक उपक्रम, देशमें इसके योगदान को देखते हुए भारत सरकार द्वारा इसे महारत्न की उपाधि से नवाजा गया है। ओएनजीसी का कार्यक्षेत्र केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों तक फैला हुआ है। देश विदेश तक अपने इसी योगदान के माध्यम से ओएनजीसी देश के विकास में भी प्रमुख भूमिका निभा रहा है। जहां एक ओर ओएनजीसी देश की आर्थिकी को बेहतर करने में मिल का पत्थर साबित हो रहा है वहीं ये प्रतिष्ठान सामाजिक कल्याण के कार्यों में भी अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। जनकल्याण के कार्यों में ओएनजीसी की भागीदारी कंपनी नियमों के आधार पर सुनिश्चित की गई है। कंपनी नियमों के मुताबिक भारत वर्ष की प्रत्येक कंपनी को अपने शुद्व लाभ का 2 प्रतिशतभाग जनकल्याण के कार्यों में लगाना अनिवार्य होता है। इसी एक्ट के तहत ओएनजीसी कंपनी भी प्रतिवर्ष अपनी आय का करोड़ों रूपये इन्हीं जनकल्याण के कार्यों में लगाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि जब ओएनजीसी लिमिटेड देश की आर्थिकी में अपना योगदान दे रहा है, जनकल्याणके कार्यों में अपनी सालाना आय का 2 प्रतिशतव्यय कर रहा है तो फिर महारत्न का महा घोटाला है क्या ? हमबेवजह पूरे ओएनजीसी लिमिटेड पर सवाल खड़ा नहीं कर रहे हैं बल्कि हम तो प्रतिष्ठान में कार्यरत कुछ उच्च एवं भ्रष्ट अधिकारियों के भ्रष्ट कारनामें आपके सम्मुख रख रहे हैं ताकि आप लोग भी इस महारत्न कंपनी के इस महाघोटाले से रूबरू हो सकें। कि आखिर सरकार की आंखों में धूल झोंककर ओएनजीसी लिमिटेड भ्रष्टाचार की पाठशाला कैसे बन गया है ?

  इससेपहले की आप शब्दों में उलझकर अपने दिमाग पर जोर डालें हम आपको बताते हैं कि आखिर ये खेल रचा कैसे गया ? वर्तमानपरिदृश्य और भ्रष्टाचार के नित नए खुलासे से आप वाकिफ हैं, अकसरवेलफेयर के नाम पर कई सोसाईटीयों द्वारा भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है। इन्हीं में से एक सोसाइटी  है जो ओएनजीसी द्वारा देहरादून में खोली गयी है और उसकी आड़ में करोड़ों के भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है। देश की महारत्न कंपनी ओएनजीसी कंपनी का मुख्यालय देहरादून में स्थित है। मुख्यालय में कार्यरत कुछ अधिकारियों द्वारा सोसाइटी की आड में घोटाला किया जा रहा है। वैसे तो ओएनजीसी द्वारा वेलफेयर के नाम पर देश में कई प्रतिष्ठान चलाए जा रहे हैं परन्तु हम देहरादून में खोले गए संस्थान ओएनजीसी महिला पॉलिटेक्निक तथा वर्तमान नाम ओएनजीसी के पूर्व सीएमडी के नाम पर बी.एस. नेगी महिला प्राविधिक प्रशिक्षण संस्थान के विषय में बात कर रहे हैं। ओएनजीसी महिला पॉलिटेक्निक वर्तमान नाम बी0एस0नेगी महिला प्राविधिक प्रशिक्षण संस्थान कौलागढ़ रोड देहरादून की स्थापना सन् 1987 मेंकी गई। उक्त संस्थान उत्तराखंड के अधीन सोसायटी एक्ट 1860 केअंतर्गत पंजीकृत है। संस्थान को प्रारंभ करने का उद्देश्य महिलाओं व गरीबबच्चों के उत्थान करने के लिए था। शुरूवाती वर्षों में तो सोसाइटी की गवर्निंग बॉडी ने ठीक से कार्य किया लेकिन विगत कई वर्षों से गवर्निंग बॉडी में चुन-चुनकर ओएनजीसी देहरादून के कार्यरत भ्रष्ट अधिकारियों को सोसायटी में रखा जा रहा है, औरउनमें से कुछ की नियुक्ति पॉलिटेक्निक के विभिन्न पदों में की जाती है। तत्पश्चात वो काम तो नियमित रूप से इस संस्थान में करते हैं लेकिन वेतन, प्रमोशनआदि अन्य सुविधाऐं उन्हें ओएनजीसी द्वारा अपने यहां दिए जाते हैं। आश्चर्य यह है कि ओएनजीसी के उच्च अधिकारियों के संज्ञान में सारा प्रकरण होने के बावजूद भी घोटालों पर कोई रोक नहीं लगाई जा रही है। हैरानी इस बात की है कि वर्षों से ओएनजीसी के अधिकारी तनख्वा, प्रमोशन, अवार्ड और अन्य सुविधाएं  तो ओएनजीसी से प्राप्त कर रहे हैं मगर काम दिन भर सोसाइटी में नियमित रूप से करते हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम से यह खुलासा भी हुआ है कि यह तमाम अधिकारी ओएनजीसी भारत रत्न कंपनी से ट्रांसफर होकर सोसाइटी में तैनात हैं जो सरेआम सरकारी सर्विस सेवा नियमावली का उल्लंघन है।

सरकारी नियमानुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी निगमका कर्मचारी, किसीनिजी या प्राइवेट सोसाइटी में ट्रांसफर नहीं हो सकता। आपको यहां पर यह भी बताते चलें कि आखिर इसके पीछे का सच है क्या ? समाजसेवाके नाम पर ओएनजीसी द्वारा देश के विभिन्न जगहों पर ऐसी सोसाइटियां बनाई गई हैं जिनका नियंत्रण और संचालन ओएनजीसी द्वारा किया जाता है नाम मात्र के लिए एक दो सदस्य स्थानीय लोगों को बनाकर यह दर्शाया जाता है कि यह महारत्न कंपनी समाज सेवा का कार्य कर रही है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि ओएनजीसी का उद्देश्य समाज सेवा का होगा और ओएनजीसी द्वारा इस तरह की सोसाइटी खोलना देश हित और राज्य हित में होगा। क्योंकि देहरादून के मुख्यालय में स्थित महिला पॉलिटेक्निक का ओएनजीसी द्वारा खोलना महिलाओं के उत्थान के लिए रहा होगा और इसका नियंत्रण ओएनजीसी के उच्च अधिकारियों की पत्नियों के नियंत्रण में था और इसमें जिला अधिकारी देहरादून को इसका मुख्य सदस्य भी बनाया गया था। ताकि राज्य की महिलाओं के उत्थान में सरकारी मशीनरी की देखरेख भी रहे और कार्य में पारदर्शिता बनी रहें। लेकिन सन् 2000 तकमाननीय जिलाधिकारी महोदय उक्त सोसायटी के सदस्य तो रहे किन्तु उन्हें कभी भी गवर्निंग बाॅडी की बैठकों में आमंत्रित नहीं किया गया। यहां तक की सन् 2000 केबाद तो उनका नाम ही संस्थान के दस्तावेजों से हटा दिया गया ताकि गवर्निंग बाॅडी द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार व अन्यअनियमित्ताओं पर पर्दा पड़ा रहे। जबकि शिक्षकों, कर्मचारियोंकी हमेशा यह मांग रही कि शासन प्रशासन के उच्च अधिकारी के अलावा संस्थान के एक शिक्षक व एककर्मचारी को गवर्निंग बाॅडी में रखा जाए जिससे पारदर्शिता बनी रहे लेकिन गवर्निंग बॉडी ने मांग को भी दरकिनार करके ठुकरा दिया। भ्रष्टाचार में लिप्त इन कुछ अधिकारियों ने स्थापना के दो ढाई साल बाद ही सोसाइटी के पैसे पर बुरी नजर डालते हुए न सिर्फनियंत्रण अपने हाथ में ले लिया बल्कि जिला अधिकारी और सोसाइटी सें अधिकारियों की पत्नियों को भी हटा दिया गया। इसके बाद महारत्न कंपनी में ओएनजीसी के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने भ्रष्टाचार का ऐसा खेल खेला जो आज तक निरंतर जारी है। ये भ्रष्टाचार हजारों लाखों में नहीं बल्कि करोडों में है। जिसकी पुष्टी वहां के पूर्व प्रिंसिपल जे एम अग्रवाल द्वारा जो कि ओएनजीसी के न होकरसेना के एक रिटायर अफसर थे द्वारा भी की गई है। महिला पॉलिटेक्निक के भ्रष्टाचार से खिन्न होकर अपने पद से इस्तीफे के बाद प्रेस कांफ्रेंस कर उन्होंने बताया कि महिला पॉलिटेक्निक घोटालों का अड्डा है और ओएनजीसी के बड़े अधिकारी सब जानकर चुप हैं। आश्चर्य है कि इंटर फेल महिला चन्द्र रेखा मेंहदीरत्ता (पूर्वनाम चन्द्र रेखा भल्ला) इनभ्रष्ट अधिकारियों की मेहरबानी के कारण न सिर्फशिक्षिका पद पर नियुक्ति पाने में सफल हुई बल्कि महिला पॉलिटेक्निक के एक विभाग की विभागाध्यक्ष भी बना दी गई है। जबकि इंटर की अंकतालिका कूटरचना करते हुए फर्जी बनाई गई है। इस फर्जी अंकतालिका प्रकरण पर कोर्ट के आदेश पर इन पर व वर्तमानप्रधानाचार्य श्रीमति हेमेश्वरी शर्मा अधिकारी ओएनजीसी पर मुकदमा भी दर्ज हो चुका है। इस खुलासे के बावजूद भी ओएनजीसी प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। ओएनजीसी तो इन भ्रष्ट अधिकारियों की पनाहगार बना है लेकिन सवाल यहां पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी उठता है। कि आखिर 8 फरवरी 2014 को कोतवाली कैंट थाने में मुकदमा दर्ज होने के बाद आज तक इन भ्रष्टाचारियों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई ?

इस तरह कई अन्य शिक्षिकाएं और भी है जो फर्जी तरीके से गलत शैक्षिक योग्यताओं के आधार पर ओएनजीसी के उक्त अधिकारियों की मिली भगत से नौकरी कर रही हैं। शिक्षकों की इस फेरिस्त से वहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य भी अधर पर लटका हुआ है। आरटीआई के माध्यम से भ्रष्टाचार के इस परत दर परत खुलासे के बावजूद भी देश की बड़ी जांच ऐजेंसियां शासनप्रशासन, ओएनजीसीके सीएमडी द्वारा आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। कार्रवाई के नाम पर भ्रष्टाचार खोलने वालों के खिलाफ ही कई मुकदमें दर्ज कर दिए गए ताकि डर से कोई उनके भ्रष्टाचार का खुलासा न करसके। महारत्न कंपनी के कुछ भ्रष्ट अधिकारी न केवलओएनजीसी की छवि को खराब कर रहे हैं बल्कि उत्तराखण्ड की देव संस्कृति से भी खिलवाड कर रहे हैं। यदि इसकी उच्च स्तरीय जाचं हो जाए जिस तरह से ओएनजीसी में डेस घोटाला, सेमिनारके नाम पर होटल का कमीशन घोटाला, मशीनघोटाला उसी तर्ज पर ओएनजीसी अधिकारियों द्वारा किया गया सोसाइटी एंजीयोज घोटाला भी जनता के सम्मुख आ जाएगा।

class="MsoNormal" style="margin-bottom:0in;margin-bottom:.0001pt"span lang="HI" style="font-size:12.0pt;line-height:115%;font-family:mangal,serif;mso-bidi-language:hi"भ्रष्टाचार के प्रमुखबिन्दू -

 

1 - ओएनजीसी जिसे अपनी सालाना आय का 2 प्रतिशतभाग जनकल्याण के कार्यों में लगाना अनिवार्य था। कंपनी एक्ट के इस नियम को दरकिनार करते हुए ओएनजीसी द्वारा वेलफेयर के नाम पर खोली गई पॉलिटेक्निक सोसाइटी में अपने ही कंपनी में कार्यरत उच्च अधिकारियों को ट्रांसफर के तहत वर्षों से नियुक्त किया जा रहा है। इस तरह ओएनजीसी संस्थान के धन के साथ-साथवेलफेयर के उस 2 प्रतिशतधन का कुछ भाग भ्रष्टाचार के तहत अपने ही अधिकारियों के माध्यम से स्वयं पर ही खर्च कर रहा है। इस तरह ओएनजीसी वेलफेयर के नाम पर भ्रष्टाचार को पाल रहा है।

 

2 - ओएनजीसी द्वारा स्वयं लिखित में दिया गया है कि उक्त संस्थान एक निजी व स्ववित्तपोषितसंस्थान है जबकि वर्षों से ओएनजीसी लिमिटेड के द्वारा अपने यहां कार्यरत अधिकारियों को ट्रांसफर के तहत उक्त संस्थान में कार्य करने हेतु नियुक्त किया जाता है, जबकिउक्त अधिकारी कार्य तो उक्त निजी संस्थान में करते हैं। परन्तु इन्हें वेतन भत्ते, पदोन्नतिव अन्यसुविधाएं ओएनजीसी द्वारा अपने यहां अर्थात सरकारी धन से ही दिए जाते हैं। साथ ही वो दोहरा लाभ लेते हुए अप्रत्यक्ष रूप से संस्थान से भी धन कमाते हैं।

 

3 - 12 मई 2011 कोडा0 जे.एम. अग्रवालजो नेवी से सेवानिवृत उच्च अधिकारी हैं तथा ओएनजीसी के कर्मचारी नहीं है, कीनियुक्ति संस्थान में बतौर प्रधानाचार्य पद पर एक विज्ञप्ति व इंटरव्यूके द्वारा की गई। लेकिन उन्होंने गवर्निंग बॉडी के भ्रष्टाचार में उनका साथ नहीं दिया और संस्थान की आय जो हमेशा घाटे में दिखाई जाती थी को उस वर्ष में लगभग 1.15 करोड़रूपय तथा संस्थान की एफडीआर जो लगभग तीन करोड़ रू0 कीथी उसे लगभग साढे़ तीन करोड़ रू0 परपहुंचा दिया। जिससे गवर्निंग बॉडी के पदाधिकारी घबरा गए और भ्रष्टाचार में शामिल न होनेके कारण उन पर अनावश्यक दबाव बनाया गया जो कि संस्थान हित में नहीं था। मजबूर होकर उन्हें 25 मई 2012 को प्रधानाचार्य पद से त्यागपत्र देना पड़ा। यहां ओएनजीसी के भ्रष्टाचार के दो पहलू सामने आ रहेहैं एक पहलू में जहां पूर्व प्रधानाचार्य श्रीमति ओम0 पी0 सूयन को संस्थान की आय बढाने के लिए महारत्न कंपनी ओएनजीसी द्वारा अवार्ड दिया जाता है वहीं दूसरे पहलू में जे एम अग्रवाल प्रधानाचार्य को संस्थान की आय में वृद्वि करने के लिए नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ता है।

 

4 - जिस भवन में संस्थान चल रहा है वह भवन ओएनजीसी का है। ओएनजीसी द्वारा भवन के किराए, बिजलीआदि के रूप में प्रतिवर्ष लगभग 4 लाखरूपये संस्थान से लिया जाता है। उसके बावजूद ओएनजीसी द्वारा अपने ही भवन की मरम्मत पर पिछले कई वर्षों में संस्थान की कमाई का लगभग 40-50 लाख रूपए लगाया जा चुका है जो कि खुला भ्रष्टाचार है, क्योंकिसोसायटी किराया देती है और ओएनजीसी वेलफेयर के नाम पर इसे चला रही है। मद्द करने की जगह ओएनजीसी संस्थान के धन का प्रयोग ओएनजीसी की बिल्डिंग की मरम्मत में कैसे कर सकता है। साथ ही साथ ओएनजीसी के अधिकारियों द्वारा सोसाइटी के धन का दुरूपयोग प्रतिवर्ष अपने लिए लाखों रूपये के गिफ्ट लेकर भी किया जाता है।

 

5 - यदि संस्थान निजी है तो उसमें कार्यरत प्रधानाचार्य श्रीमति ओम पी0 सुयनको सन् 2010 मेंओएनजीसी द्वारा प्रदान किया जाने वाला व्यक्तिगत तथा समूह पुरस्कार 2009, रूपये 25000 तथा मैरिट सर्टिफिकेट कैसे प्रदान किया गया। जबकि ये अवार्ड ओएनजीसी में कार्यरत  कर्मचारियों को ओएनजीसी के हित में किए गए महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है। जबकि श्रीमति सुयन ने तो वर्ष 2004 से 2011 तक महिला पाॅलीटेक्निक में नियमित रूप से अपनी सेवायें प्रदान की तो आखिर ओएनजीसी ने किस आधार पर इन्हें उक्त पुरस्कार प्रदान किया ? साक्ष्यकहते हैं कि 2004 सेपूर्व वो ओएनजीसी में चीफ मैनेजर पी. एण्डए. पदपर कार्यरत थी और वर्तमान में वे ओएनजीसी से जीएम एच आर पद से अप्रैल 2014 मेंरिटायर हो गई हैं।

भ्रष्टाचार के इन बिन्दुओं से यह साफ परिलक्षित होता है कि ओएनजीसी के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिली भगत से वेलफेयर के नाम पर कई वर्षों से भ्रष्टाचार का ये व्यूह रचा जा रहा है। भ्रष्टाचार के इस प्रकरण की जानकारी सबको है लेकिन इस पर कोई भी अपनी जुबान खोलना नहीं चाहता। बेशक ओएनजीसी मूक दर्शक बने भ्रष्टाचार के इस खेल को रोकने का प्रयास न कररहा हो लेकिन कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब ओएनजीसी को आज नही तो कल देने ही होंगें। ओएनजीसी दोहरा चरित्र अपनाए हुए है जिसका खुलासा जरूरी है। क्योंकि एक तरफ ओएनजीसी यह दावा कर रही है कि महिला पॉलिटेक्निक परिवर्तित नाम बी.एसनेगी महिला पॉलिटेक्निक ओएनजीसी द्वारा स्थापित, निर्मित, नियंत्रित व कतईवित्त पोषित नहीं है साथ ही ओएनजीसी के अधीन एवं स्वामित्व में भी नहीं है, तोदूसरी तरफ किन मानकों के आधार पर ओएनजीसी द्वारा अपने यहां कार्यरत अधिकारियों को गवर्निंग बाडी के साथ-साथसंस्थान के उच्च पदों पर कार्य करने हेतु ट्रांसफर के तहत नियुक्त किया जा रहा है। जबकि केंद्र सूचना आयोग द्वारा भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस पॉलिटेक्निक को सार्वजनिक उपक्रम मानते हुए ओएनजीसी के नियंत्रण में माना गया है। कई ऐसे तथ्य भी मौजूद हैं जो ये दावा करते हैं कि ये पॉलिटेक्निक ओएनजीसी द्वारा ही संचालित है।

   जहांएक ओर पॉलिटेक्निक की पूर्व प्रधानाचार्य श्रीमति ओम0 पी0 सूयन को संस्थान की आय बढ़ाने के लिए महारत्न कंपनी ओएनजीसी द्वारा अवार्ड से नवाजा जाता है वहीं इस सवाल का जवाब भी आवश्यक हो जाता है कि आखिर आय में वृद्वि के बाद भी प्रधानाचार्य जे.एम.अग्रवाल को पद से इस्तीफा देने को मजबूर क्यों किया गया ?

ओएनजीसी के दोहरे चरित्र और सार्वनजिक धन के दुरूपयोग को लेकर भ्रष्टाचार की ये पड़ताल शुरू की गई। इस सम्बन्ध में आरटीआई के माध्यम से सम्बन्धित सूचनाऐं मांगी गई और प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर जो खुलासे हुए हैं वो हमने आपको अपने इस खुलासे के माध्यम से बताने की कोशिश की है। क्योंकि देश की हर जांच ऐजेंसी व सम्बन्धितप्रशासनिक संस्थान को साक्ष्य सहित शिकायतें प्रेशित की गई परन्तु कहीं से भी संतोश जनक कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है। जैसे वर्तमान में आरटीआई की एक द्वितीय अपील मुख्य सूचना आयुक्त उत्तराखंड के समक्ष चल रही है। जिसमें मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा बिना अपील संख्या के ही अपील की सुनवाई करते हुए अपीलार्थी से ही अधिक से अधिक दस्तावेज मांगे जा रहे हैं जबकि सम्बन्धित विभाग से अपीलार्थी को किसी भी तरह के दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। साथ ही लोक सूचना अधिकारी/अपीलीयअधिकारी को किसी भी कार्रवाई की तिथि में न बुलाकरअपीलार्थी से प्राप्त दस्तावेजों को उनको उपलब्ध कराया जा रहा है। मुख्य सूचना आयुक्त का सम्बन्धित विभाग के प्रति ये नर्म रवैया दाल में कुछ काला होने की ओर इशारा कर रहा है।

   इसभ्रश्टाचार के खुलासे के बावजूद भी सभी विभाग इस मामले को रफा-दफाकरने में लगे हैं। यहां पुलिस प्रशासन का भी दोहरा चरित्र सामने आता है कि सभी तरह के सबूत उपलब्ध कराने के बावजूद भी पहले पुलिस प्रशासन ने केस दर्ज करने से ही इंकार कर दिया लेकिन कोर्ट के आदेश के आधार पर पुलिस प्रशासन को मुकदमा दर्ज करना पड़ा। पुलिस विभाग ने मुकदमा तो दर्ज कर दिया परन्तु आज तक किसी भी तरह की कोई कार्रवाई होती हुई नहीं दिखाई देती। यहां भी ऐसा लगता है कि पुलिस प्रशासन को भी काली दाल बहुत पंसद है...............।

भ्रष्टाचार का खुलासे करते, इनतथ्यों के उजागर होने के बाद ओएनजीसी जहां अपने तथ्यों में खुद ही उलझती नजर आ रहीहै वही इसका दोहरा चरित्र भी सामने आ गयाहै। ओएनजीसी इस संस्थान को निजी बता रही है तो फिर संस्थान का मालिक है कौन ? संस्थानको चलाने वाली गवर्निंग बॉडी के निर्माता कौन है और इस गर्वनिंग बॉडी के 80 प्रतिशतपदों पर ओएनजीसी में कार्यरत अधिकारियों की तैनाती क्यों हैं ? स्पष्टीकरणइसका भी जरूरी है कि जिला अधिकारी महोदय जो वर्ष 2000 तकइस बॉडी के प्रमुख सदस्य नियुक्त थे तो कौन से उद्देश्यों की पूर्ति हेतू उन्हें बिना किसी कारण गवर्निंग बॉडी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। एक बड़ी विडंबना ये भी है कि भ्रष्टाचार के तहत जिलाधिकारी को तो गवर्निंग बॉडी से रफा-दफाकर दिया गया लेकिन इस तरह बॉडी से निकाले जाने का जिला अधिकारी द्वारा भी संज्ञान नहंी लिया गया। साथ ही इस बॉडी का नामित सदस्य होने के बावजूद भी बिना कारण गवर्निंग बॉडी से निकाले जाने और भ्रष्टाचार की तमाम जानकारियों से समय-समयपर सूचित होने के बावजूद भी आखिर निरंकुशता क्यों बरती गई ?

   इसभ्रष्टाचार में लिप्त ओएनजीसी के कुछ उच्च अधिकारियों द्वारा सोसाइटी वेलफेयर के इस प्रकरण में करोड़ों रूपये के सार्वजनिक धन का दुरूपयोग किया गया है जिसका खुलासा होना अति आवश्यक है। क्योंकि यह महत्वपूर्ण है कि महारत्न की छवि पर दाग लगाने वालों के चेहरे जनता के सामने बेनकाब हों क्योंकि इस धन का प्रयोग जनकल्याणकारी कार्यों में किया जाना था जिससे देश की छवि में कुछ सुनहरे अध्याय अंकित होते। लेकिन इन कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की लालसा ने देश के विकास को तो कई कदम पीछे कर ही दिया साथ में ओएनजीसी जो देश को एक नई दिशा देने वाला व देशको गौरवान्वित करने वाला प्रतिष्ठान है इसमें कार्यरत उक्त अधिकारियों द्वारा शर्मनाक कृत्यों को अंजाम देकर ओएनजीसी महारत्न की साख में बट्टा भी लगाया गया। इस भ्रष्टाचार को उजागर करना इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि इस भ्रष्ट तंत्र ने केवल अपनी ही जेबे भरने का काम नहीं किया बल्कि संस्थान में पढ़ने वाले उन मासूमों के सपनों को भी कुचलने का निहायति बुरा कार्य किया है जिससे उनके भविष्य को संवारा जाना था। भ्रष्टाचार में लिप्त ओएनजीसी के कुछ उच्च अधिकारी ये भूल गए कि जिस धन का उपयोग वो अपने निजी स्वार्थ के लिए कर रहे हैं उसका उपयोग उन मासूमों के विकास में लगाते जिससे वे मासूम सफल होकर देश के कोने-कोनेमें जाकर देश की समृद्वि में अपना योगदान देते। इस धन का उपयोग भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं एवं परियोजनाओं को लाभान्वित करने के लिए भी किया जा सकता था। इस धनराशी का प्रयोग कहां होना चाहिए था, कहांहुआ और कहां हो सकता था इस पर तो हमने अपनी राय रख दी लेकिन हकीकत यही बयां कर रही है कि ऐसा कुछ हो न सका।भ्रष्टाचार के इस कृत्य में लिप्त कुछ ओएनजीसी अधिकारियों ने केवल धन का ही गोलमाल नहीं किया बल्कि जनकल्याण की उन भावनाओं को भी गहरा आघात पहुंचाया है जो इनकी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे थे। इसांनी मन दुखाने के लिए इन्हें पश्च्यताप तो करना ही होगा लेकिन भ्रष्टाचार को जन्म देने और फलने-फूलनेमें भागीदार होने पर इन्हें उचित दण्ड देना भी जरूरी हो गया है, ताकिफिर कोई वेलफेयर के नाम पर मासूम लोगों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ न करेऔर भ्रष्टाचार को बेझिझक अपना हथियार समझने वाले इन भ्रष्टाचारियों को सबक मिल सके कि गुहान चाहे कितनी ही सफाई से किया जाय न्याय की अदालत में हर गुनेहगार को इसका हिसाब देना ही पड़ता है। न्याय प्रणाली में इसी विश्वास के साथ हम उम्मीद करते हैं कि इस भ्रष्टाचार का भी खुलासा हो और भ्रष्टाचारियों को सलाखें नसीब हों।

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